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________________ स्या० क० टीका- हिन्दीविवेचना ] उपन्यस्तशेषं निराकरोति मूलं असतुत्पत्तिरप्येवं नास्यैव प्रागसत्त्वतः । किन्त्व सरसद्भवत्येवमिति सम्यग्विचार्यताम् ॥६४॥ [ १० असदुत्पत्तिरपि एवम् उक्तप्रकारेण नास्य = अधिकृतभावस्य प्रागसस्वत एव = प्राक्कालवृत्तित्वाभावमात्रादेव, किन्तु एवं स्वदभ्युपगमरीत्या असत् सद् भवति इति सम्यक् = सूक्ष्माभोगेन विचार्यताम् । तथाहि नाशवत् प्रागभावोऽपि तव तुच्छ एव ततस्तत्संबंधादसत्वमेव वस्तुन आपतितम् इत्यसत एवोत्पच्या सद्भवनं सिद्धम् । + , अथ प्रागभावसम्बन्धित्वरूपं प्रागसच्यं काल्पनिकमेव, तात्विकं त्वधिकरणात्मकप्रातकाल, परिव्याप्यम् अतो न प्रागसत्त्वस्य तुच्छत्वे तच्चतस्तदभावविकल्पेनाऽपि प्राक्सत्त्वप्रसङ्गावकाशः, धर्मिरूपतदभावे सत्युत्पत्तिरूपायाः सत्तायाः प्राच्यत्वायोगात् प्रागेव प्रागसत्त्वाभावकल्पनायाश्च प्रागसत्त्वकल्पनाप्रतिरोधादेवानुदयात्, असद्विषयत्वे तस्या भ्रमत्वव्यवस्थितेः, तद्भ्रमत्वेनाऽपि तदसिद्धेरिति चेत् ? न, असत्या अपि " होगा । एवं असल को सस्य का लाभ अर्थात् श्रसत् को सदवस्था की प्राप्ति भी यदि नियम से हो तो शशसींगादि में सता का लाभ यानी सववस्था की प्राप्ति को प्रापत्ति होगी। दूसरी बात यह है कि इन दोनों ही पक्षमें कौन किसका कार्य हो इस बात का कोई नियम न हो सकने से 'घटादि मिट्टी का ही कार्य है' यह व्यवस्था उपपक्ष न हो सकेगी ॥१६३. ( प्रागसत्त्व होने से असत् की उत्पत्ति होने का पक्ष असार है ) ६४ वीं कारिका में पूर्वप्रदर्शित पूर्वपक्ष के बचे हुये प्रनिराकृत भाग का निराकरण किया गया है । कारिका का अर्थ इस प्रकार है प्रसत् को उत्पत्ति मो बौद्धाभिमत रीतिसे उत्पन्न होनेवाले पदार्थ के उत्पत्तिप्राककालिकप्रसत्त्व मात्र से ही नहीं हो सकती। क्योंकि ऐसा मानने पर सूक्ष्म विचार से यही प्राप्त होता है कि असत् ही सत् होता है। श्राशय यह है कि बौद्ध के मत में नाश के समान प्रागभाव भी तुच्छ है । श्रतः वस्तु का प्रागभाव मानने से उसका प्रसत्त्व ही प्राप्त होता है, इसलिये उत्पत्ति द्वारा असत् का हो सत् होना सिद्ध होता है। [ प्रागसत्य की तुच्छता से प्राक् सत्त्व की प्रापत्ति नहीं है - बौद्ध ) बौद्ध की भोर से यह पूर्वपक्ष स्थापित किया जाय कि "उत्पत्ति के पूर्व जो भाव का सत्त्व माना जाता है और जिसे प्रागभावसम्बन्धित्व रूप कहा जाता है वह काल्पनिक है। किन्तु उत्पन्न होने वाले पदार्थ का जो उत्पत्ति के पूर्व काल में प्रभाव है प्रथवा उत्पन्न होने वाले पदार्थ में जो उत्पत्ति के पूर्व कालकी वृत्तित्ता का प्रभाव है वहो उसका प्राक् कालिक प्रसव है और वह अधि करणात्मक होने से तात्विक है। क्योंकि असत्त्व यदि प्राक्काल में वस्तु का प्रभावरूप है तो उसका
SR No.090419
Book TitleShastravartta Samucchaya Part 4
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorBadrinath Shukla
PublisherDivya Darshan Trust
Publication Year
Total Pages248
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size8 MB
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