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________________ शायश प्रकाश १५६ सचित्यागी ( पमप्रतिमा ) का लक्षण सचितं वस्तु नो भुङ्क्ते योऽम्भः पत्रफलाविकम् । स सचित परित्यागी कथ्यते वयया युतः ॥ १०४ ॥ अर्थ -- जो दयासे युक्त होता हुआ पानी, पत्र तथा फलादिक सचित्त वस्तुको नहीं खाता है वह सचित्त त्यागी पञ्चम श्रावक कहलाता है ॥ १०४ ॥ रात्रिभुक्ति त्यागी ( षष्ठ प्रतिमा ) का स्वरूप रात्रिमध्ये न यो मुङ्क्ते भोजनं च चतुविधम् । रात्रिमुक्ति परित्यागी षष्ठोऽसौ श्रावकः स्मृतः ॥ १०५ ॥ अर्थ- जो रात्रि में चार प्रकार का भोजन नहीं करता है वह रात्रिभुक्ति त्यागी षष्ठ श्रावक कहलाता है || १०५ ॥ ब्रह्मचारी ( सप्तम प्रतिमा ) का लक्षण वारमात्र परित्यागी ब्रह्मधारी समुच्यते । विरक्तिभावमापन्नो विभोतश्च भवार्णवात् ॥ १०६ ॥ अर्थ -- जो स्त्रो मात्रका परित्यागी है, वैराग्यभावको प्राप्त है तथा संसार सागरसं भयभीत है वह ब्रह्मचारी सप्तम प्रतिमाका धारी श्रावक कहलाता है ॥ १०६ ॥ आरम्भत्यागो ( अष्टम प्रतिमा ) का लक्षण पुरासंचित वित्तेषु सतुष्टोऽन्यगतस्पृहः । व्यापारस्य परित्यागी त्यक्तारम्भः समुच्यते ॥ १०७ ॥ अर्थ - जो पहले संचित किये हुए धनमें संतुष्ट है, अन्य घनमें जिसकी इच्छा समाप्त हो गई है और जिसने व्यापारका परित्याग कर दिया है वह आरम्भत्यागो अष्टम प्रतिमाधारो श्रावक कहलाता है ॥ १०७ ॥ अपरिग्रह ( नवम प्रतिमा ) का लक्षण मुक्त्वा ह्यावश्यकं वस्त्रं भाजनं च कटादिकम् । यो नाभ्यधनमावत्तं सोऽपरिग्रह उच्यते ॥ १०८ ॥ अर्थ -- जो आवश्यक वस्त्र, बर्तन और चटाई आदिको छोड़कर अन्य परिग्रहको ग्रहण नहीं करता है वह अपरिग्रह नवम प्रतिभाधारी श्रावक कहलाता है ।। १०८ ।।
SR No.090411
Book TitleSamyak Charitra Chintaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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