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________________ दशम प्रकाश १३५ पुरुषार्थसे इस संसार सारस पार होते हैं। यथार्थमें आपका संसार क्षीण हो गया है इसीलिये भोगोंसे विरक्ति हुई है ॥ १५-१७ ॥ आगे श्री गुरु उन्हें आयिकाके व्रत का उपदेश देते हैं महावतानि सन्धत समितीनां च पञ्चशम् । पञ्चेन्द्रियजयः कार्यः षडावश्यकपालनम् ॥ १८॥ विधिना नित्यशः कार्य न कुर्याद् दन्तधावनम् । एकवारं दिवाभोज्यमुपविश्य सुखासनात् ॥ १९ ॥ हस्तयोरेवभोक्तव्यं न तु धात्वाविभाजने । शुभंकाशाटिका घार्या मिताषोडशहस्तकः ॥ २० ॥ भूमिशय्या विधासध्या रजन्याश्चोभागके । कचानां लुचन कार्य स्वहस्ताभ्यां नियोगतः ।। २१ ॥ मासवयेन मासैस्तु त्रिभितिचतुष्टयात् । गणिन्या सहकर्तव्यो निवासो रक्षितस्थल ॥ २२ ।। चर्यार्थ सहगन्तव्यं नगरे निगमे तथा। अन्याभिः सह साध्वीभिः श्रावकःणां गृहेषु वै ।। २३ ।। एकाकिन्या विहारो न कर्तव्यो जातचित क्वचित् । आचार्याणां समोपेऽपि न गच्छेदेकमात्रका ।। २४ ॥ गणिग्या सामन्यामिद्विवाभिर्वा सह व्रजेत् । सप्तहस्तान्तरे स्थित्वा विनयेनोपविश्य वा ॥ २५॥ प्रश्नोत्तराणि कार्याणि सार्धमन्यतपस्विभिः । गहिणीजनसम्पकों ने कार्यों बिकथाकृते ।। २६ ।। जिनवाणीसमभ्यासे कार्यः कालस्य निर्गमः । काले सामायिक कार्य स्वाध्यायः समये तथा ।। २७ ।। पादयात्रेव कर्तव्या न जात वाहनाश्रयः ।। अग्नेः सन्तापनं शीते न चौधण्ये जलसेचनम् ॥ २८।। कार्य विहार काले च पादाणं न धारयेत् । इदमार्यावतं प्रोक्तं भवतीनां पुरो मया ॥ २९ ॥ अर्थ-महाव्रत धारण करो, पांच समितियों का पालन करो, पञ्चेन्द्रियविजय करो, पदके अनुरूप नित्य हो विधिपूर्वक षडावश्यकका पालन करो, दन्त धावन न करो, दिनमें एक बार सुखासन--- पालथोसे बैठकर हाथों में भोजन करो, धातु आदिके पात्रों में भोजन नहीं करो, सोलह हाथ की एक सफेद शाटो धारण करो, रात्रिके उत्तरार्धमें
SR No.090411
Book TitleSamyak Charitra Chintaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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