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________________ १०८ सम्यक्षारित्र-चिन्तामणिः मुख चन्द्रका सौन्दर्य नष्ट होकर कहीं विलीन हो जाता है। हाथीको सूंड़के समान आभा वालो भुजाएँ सूखी मृणालके समान हो जाती हैं। मोतियोंको जीतने वाले मुख दांत सूट होकर कहा बरे माते हैं: जीवोंका जीवन शरद्के बादलोंके समान भङ्गुर है । धन सम्पत्ति नश्वर है, सौन्दर्य सम्पदा अस्थिर है । इस प्रकार हे आत्मन् ! वस्तु स्वभावका विचारकर तूं निरन्तर स्वस्थ रह अपना उपयोग अन्य पदार्थों में मत घमा। पर्यायापिकनपकी अपेक्षा सब पदार्थ अनित्य ही हैं और द्रव्यार्थिक नयको अपेक्षा सब पदार्थ नित्य हो हैं ।। २-११ ॥ आगे अशरण भावनाका चिन्तवन करते हैं कण्ठौरवसमाकारतकुरङ्गस्येव कानने । यमाक्रान्तस्य जोवस्य नास्तीह शरणं क्यचित् ॥ १२ ॥ माता स्वसा पिता पुत्रो भ्राताम्रातृसुतोऽपि च । एते सर्वे मिलित्वापि त्रायन्ते ने मृत्युतः ॥ १३ ॥ दावानलेन संव्याप्ते गहने पावपस्थितः । वग्धं सर्व विलोक्याप्य दग्धं स्वं मन्यते यथा ।। १४ ।। सष निखिल लोक मृत्युम्यानमुखस्थितम् । दृष्ट्वापि हात मोऽयं स्वं स्वस्थ मन्यते मुधा ।। १५ ॥ निगते जीविते जीवं गृहान् निःसारयन्ति हा । बान्धवा मित्रवर्गाश्च नयन्ते शवशायनम् ॥ १६ ॥ भस्मयन्ति मिलित्वा ते विलपन्ति स्वन्ति च । विपद्यमानान् दृष्ट्वापि मृतःप्रत्येति न चित् ॥ १७ ॥ संसारस्य स्वभावोऽयमनाविनिधनो मतः।। उत्पद्यन्ते म्रियन्ते च जोवा भवमरुस्थले ।। १८॥ कोऽपि केनापि साधं नो याति वै प्रतियाति नो। एक एव सुहळू धर्मः सार्धं जीवेन गछति ॥ १९॥ शैले बने तडागे वा शैलस्य शिखरेष्वपि । धर्म एव परो बन्धुस्तरणं भववारिधः ।। २० ।। आत्मन्नशरणं मत्वा धर्मस्य शरणं व्रज । धर्मावृते न कोऽप्यस्ति त्राता तब जगस्त्रये ॥२१॥ अर्थ-जिस प्रकार वनमें सिंह के द्वारा चपेटे हुए हरिणका कोई शरण-रक्षक नहीं है उसो प्रकार यमके द्वारा आक्रान्त जोवको कहीं कोई शरण नहीं है। माता, वहिन, पिता, पुत्र, भाई और भतीजा, ये सब
SR No.090411
Book TitleSamyak Charitra Chintaman
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year
Total Pages234
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size4 MB
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