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________________ सम्याजानन्द्रिका भावाटीका । औषधि सेवन करि रोग नष्ट हो है; तैसें मंगल करने करि विघ्नकर्ता अन्तरायकर्म के नाश का अविरोध है, तात शंका न करनी। जैसे प्रथम प्रयोजन दृढ़ कीया । बहुरि तर्क - जो ऐसा न्याय है "सर्दशा रनहितम् सहारिन किं करिष्यति जनो बहुजल्पः । . विद्यते नहि स कश्चिदुपाय सर्वलोकपरितोषकरो यः ॥" . याका अर्थ – जो सर्वप्रकार कर अपना हित का आँचरण करना । अपना हित करतें बहुत बकै है जो मनुष्यलोक, सो कहा करंगा? अर कोऊ कहै जो सर्व प्रसन्न होइ, सो कार्य करना; तो लोक विर्षे सो कोई उपाय ही नाहीं, जो सर्व लोक कौं संतोष करै । जैसे न्याय करि जाकर प्रारंभ करो हो, ताका प्रारंभ करौ । नास्तिकवादी का परिहार करि कहा साध्य है ? तहां कहिए है - असा भी न कहना । जाते प्रशम, संवेग अनुकंपा, आस्तिक्य गुण का प्रगट होनेरूप लक्षण का धारी सम्यग्दर्शन है । याते नास्तिकवादी का परिहार करि प्राप्त जो सर्वज्ञ, तिहने प्रादि देकरि पदार्थनि विर्षे जो आस्तिक्य भाव हो है, ताके सम्यग्दर्शन का प्राप्ति करने का कारणपना पाइए है । बहुरि अंसा प्रसिद्ध वचन है "यपि विमलो योगी, छिद्रान् पश्यति मेदनि । तथापि लौकिकाचार', मतसापि न लंघयेस् ।" याका अर्थ - यद्यपि योगीश्वर निर्मल है, तथापि पृथ्वी वाके भी छिद्रनि कौं देखे है । तातै लौकिक आचार कू मन करि भी उल्लंघन न करै; असे प्रसिद्ध है । तात नास्तिक का परिहार कीया चाहिये । औसैं दूसरा प्रयोजन दृढ कीया । बहुरि सर्क - जो शिष्टचार का पालन किस अर्थ करिए ? तहां कहिए है - असा विचार योग्य नाहीं, जाते असा वचन मुख्य है "प्रायेण गुरुजनशीलमनुचरंति शिष्याः।" याका अर्थ - जे शिष्य हैं ते, अतिशय करि गुरुजन का जु स्वभाव, ताकौं अनुसार करि प्राचरण करै हैं । बहुरि असा न्याय है - "मगलं निमित्तं हेतु परिमाणं नाम कारमिति षडपि व्याकृत्याचार्याः पश्चाच्छास्त्र व्याकुर्वन्तु" याका अर्थ-जो मंगल, निमित्त हेतु, परिमाण, नाम, कर्ता इन छहों की पहिले करि
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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