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________________ ७१२ } वर्षyear क्षायिकाः, संख्येया यदि भवंति सौधर्मे । तहि संख्ययस्थितिके, कति एवमनुपाते ||६५७॥ गोम्मटसर बीकाण्ड गाथा ६५८-६५९ -7 टीका afre सम्यक्त्व बहुत कल्पवासी देव हो हैं । बहुरि कल्पवासी देव बहुत सौधर्म - ईशान विष हैं, तातें कहें। जो पृथक्त्व वर्ष विषं क्षायिक सम्यक्वी सौधर्म ईशान विषै संख्यात प्रमाण उपजे तो संख्यात पल्य की स्थिति विषै कितने उपजें ? अंसा त्रैराशिक करना । इहां प्रमाण राशि पृथक्त्व व प्रमाण काल, फलराशि संख्यात जीव, इच्छा राशि संख्या पल्य प्रमाण, कालसो फलत इच्छा क गुरौं, प्रमाण का भाग दीएं जो लब्धि राशि भयर सो कहैं हैं संखावलिहिदपल्ला, खइया तत्तो य वेवमुवसमया । आमणिजसंगुलिया, असंखगुणहोणया कमसो ||६५८ ॥ संख्यावलिहितपत्याः क्षायिकास्ततश्च वेदमुपशमकाः । आवल्यसंख्यगुणिता, असंख्यगुणहीनकाः क्रमशः १६५८ ।। -- टीका सो लब्ध राशि का प्रमाण संख्यात बावली का भाग पत्य की दीएं, जो प्रमाण होइ, तिसना आया, सो तितने ही क्षायिक सम्यग्दृष्टी जानने । बहुरि इन प्रावली का असंख्यातवां भाग करि गुणै, जो प्रमाण होइ, तितने वेदक सभ्य दृष्टी जानने । बहुरि क्षायिक जीवां का परिमाण ही तें असंख्यात गुणा घाटि उपशाम सम्यग्दृष्टी जीव जानने । पल्लासंखेज्जदिमा, सासाणमिच्छा य संखगुणिदा हु । मिस्सा तहिं विहोणो, संसारी वामपरिमाणं ॥ ६५६ ॥ पत्याख्याताः, सासन मिथ्याश्च संख्यगुखिता हि । मिश्रास्तविहीनः संसारी वामपरिमाणम् ||६५६॥ टीका - पल्य के असंख्यातवें भाग प्रमाण सासादन, तेई मिथ्याती सामान्य हैं, तिनका परिमाण है, तिनतें संख्यात गुणे सम्यग्मिथ्यादृष्टी जीव है । बहुरि इन पंच सम्यक्त्व संयुक्त जीवनि का मिलाया हूवा परिमाण की संसारी राशि में घटाएं, जो प्रमाण अवशेष रहे, तितने वाम कहिए मिध्यादृष्टी, तिनिका परिमाण है ।
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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