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________________ ६७५ ] [ गोम्मटसार जोधकाण्ड माया ५६५ बहुरि अन्य बाईस वर्गणानि विषे भेद हैं। वहां जघन्य श्रर उत्कृष्ट भेद, सो कहिये हैं - जधन्य के ऊपर एक एक परमाणू उत्कृष्ट का नीचा पर्यत बधावने तें जैते भेद होहि, तितनें मध्य के भेद जानने । #! बहुरि संख्याताणुवर्गेणा विषै जथत्य दोय अणूनि का स्कंध है । पर उत्कृष्ट उत्कृष्ट संख्या अणूनि का स्कंध है । बहुरि प्रसंख्याता वा विषे? जधन्य परीतासंस्थात परमाणूनि का स्कंध है, उत्कृष्ट उत्कृष्ट असंख्याता संख्यात परमाणूनि का स्कंध है । इहां विवक्षित वर्गणा carat के निमित्त गुणकार का ज्ञान करना होइ तो विवक्षित वर्गरणा को ताके नीचे की वर्मा का भाग दीए, जो प्रमाण श्रावै, सोई गुणकार का प्रमाण जानना । तिस गुणकार करि नीचे की वर्गणा की मुणे, विवक्षित वर्गला हो है । जैसें विवक्षित तीन अणूं का स्कंध पर नीचे दोय परमाणू का स्कंध, तहां तीन को दोय का भाग दीए ड्योढ पाया; सोई गुणकार है । दोय कौं घोढ करि गुंगिए, तब तीन होइ; असे सर्वत्र जानना | बहुरि इहां संख्याताणु संख्याताणु वर्मणा विषै जघन्य का भाग उस्कुष्ट को दोएं, जो प्रमाण भावे, सोई जघन्य को गुणकार जानना । इस गुणकार करि जघन्य की गुरौं, उत्कृष्ट भेद हो है । " बहूरि ताके ऊपर अनंताणुवर्गणा विषे उत्कृष्ट असंख्याताणु वर्गणा तें एक परमाणू अधिक भये जघन्य भेद हो है । भर जघन्य को सिद्ध राशि का अनंतवां भाग मात्र जो अनंत, ताकरि गुण, उत्कृष्ट भेद हो है । 3 बहुरि ताके ऊपर आहार वर्गणा विषै उत्कृष्ट अनंताणुवर्गेणा तें एक परमाणू fee भए जघन्य भेद हो है । बहुरि इस जघन्य को सिद्धराशि का अनंतवां भाग मात्र जो अनंत, ताका भाग दीये, जो प्रमाण आर्य, तितने जघन्य तें अधिक भये उत्कृष्ट भेद हो है । ! बहुरि ताके ऊपर ग्राह्यवर्गणा है। तीहि विषै उत्कृष्ट ग्राहारवर्गणा तें एक परमाणू अधिक भए, जघन्य भेद हो है । बहुरि जधन्य भेद को सिद्धराशि का अनं तव भागमात्र जो अनंत करि गुणै उत्कृष्ट भेद हो है । १. प्रति में यहां 'जघन्य' शब्द अधिक मिलता है ।
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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