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________________ mainmedia सम्यग्ज्ञानन्द्रिका भावाटीका } [ ६७७ अणुसंखासंखेज्जारता य अगेज्जणेहि अंतरिया। आहार-तेज-भासा-मरण-कम्मइया धुवक्खंधा ॥५६४॥ सांतरणिरंतरेण य, सुण्णा पत्तेयवेहधुवसुण्णा। . बादरणिगोवसुण्णा, सुहमणिगोदा णभो महक्खंधा ॥५६॥ जुम्म । अणुसंख्यातासंख्यातानन्तास अग्राहकाभिरन्तरिताः । माहारतेजोभाषामनःकार्माण ध्रुषस्कन्धाः ।।५९४॥ सान्तरनिरन्तरया छ, शुन्या प्रत्येकदेह-ध्रुवशून्याः ।: १ बादरनिगोदशून्याः, सूक्ष्मनिगोवा नभो महास्कन्धाः ॥५६॥ युग्मम् टीका --- पुदगल द्रव्य के भेदरूप जे वर्गणा, ते तेईस भेद लीएं हैं - १ अणुवर्पणा, २ संख्याताणुवर्गरणा, ३ असंख्याताशुवर्गणा, ४ अनंताणुवर्मणा, ५ आहारवरिणा, ६ अग्राह्यवर्गरणा, ७ तैजस शरीरवर्गरणा, ८ अग्राह्यवर्गरणा, ६ भाषावर्गरणा, १० अग्राह्य धर्गणा, ११ मनोवर्गरणा, १२ अग्राह्य वर्गणा, १३ काणि वर्गणा, १४ ध्रुव वर्गणा, १५ सांतरनिरंतर वर्गरणा, १६ शून्य वर्गणा, १७ प्रत्येक शरीरवर्गणा, १८ ध्रुवशून्य वर्गणा, १६ बादरनिगोद वर्गणा, २० शून्यवर्गणा, २६ सूक्ष्मनिगोद वर्गरणा, २२ नभो वर्गर, २३ महास्कंधवर्गणा ए तेईस भेद जानने।। इहां प्रासंगिक श्लोक कहिये हैं मूतिमत्सु पदार्थेषु, संसारिण्यपि पुद्गलः। .. अकर्मकमनोकर्मजातिभेदेषु वर्गणा ।।१॥ . . . . . . : मूर्तीक पदार्थनि विर्षे पर संसारी जीव विर्षे पुद्गल शब्द प्रवत है । बहुरि अकर्म जाति के कर्म जाति के नोकर्म जाति के जे पुद्गल, तिनि विर्षे वर्गरणा शब्द प्रवर्ते है.। सो अव इहां तेईस. जाति की वर्गणनि विर्षे केले के परमाणू पाइये ? सो प्रमाण कहिये हैं- .... .. . , तहां अणुवर्गणा तो एक एक परमाणू रूप है। इस विर्षे जघन्य, उत्कृष्ट, मध्य भेद भी नाहीं है।
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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