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________________ - 2 . . .. .. सभ्यतानचन्द्रिका भाषाटोका ) । ६७३ संखेज्जासंखेज्जाणता वा होति पोग्गलपदेसा । लोगागासेव ठिदी, एगपवेसो अणुस्स हवे ॥५८६॥ संख्येयासंख्येयानंता वा भवंति पुद्गलप्रदेशाः ।। लोकाकाशे एव, स्थितिरेकप्रवेशोऽयोर्भवेत् ॥५८६॥ टीका- दोय अणू का स्कंध तें लगाई, पुद्गल स्कंध संख्यात, असंख्यात, अनंत परमाणुरूप है । तथापि ते वे सर्व लोकाकाश ही विषै तिष्ठे हैं। जैसे संपूर्ण जल करि भर्या हूवा पात्र विर्षे क्रम ते गेरे हुवे लवण, मस्मी, सूई आदि एक क्षेत्रावगाहरूप तिष्ठे हैं; तैसें जानना । बहुरि अविभागी परमाणू का क्षेत्र एक ही प्रदेशमात्र हो है लोगागासपदेसा, छहब्वेहिः फडा सदा होति । सव्वमलोगागासं, अण्णेहिं विवज्जियं होदि ॥५८७॥ लोकाकाशप्रदेशाः, षद्रव्यैः स्फुटाः सदा भवति । सर्वमलोभाकाशमन्यविजितं भवति ॥५८७।। टोकर -- लोकाकाश के प्रदेश सर्व ही षद्रव्यनि करि सदाकाल प्रगट व्याप्त हैं । बहुरि प्रलोकाकाश सर्व ही अन्य द्रव्यनि करि रहित है। इंति क्षेत्राधिकारः । जीवा अणंतसंखाणंतगुणा पुग्गला हु ततो दु । धम्मतियं एक्केवक, लोगपदेसप्पमा कालो ॥५८८॥ जीवा अनंतसंख्या, अनंतगुणाः पुद्गला हि ततस्तु । धर्मत्रिकमेकक, लोकप्रदेशप्रमः कालः ॥५८।। टीका - संख्या कहै हैं - तहां द्रव्य परिमारण करि जीव द्रव्य अनंत हैं। बहुरि तिनि ते अनंत गुरणे पुद्गल के परमाणू हैं । बहुरि धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य आकाश द्रव्य एक-एक ही हैं; जाते ए तीनौं प्रखंड द्रव्य हैं । बहुरि जेते लोकाकाश के प्रदेश हैं, तितने कालाणू हैं-- लोगागासपदेसे, एक्केक्के जे ठ्यिा हु एक्केक्का। रयणाणं रासी इव, ते कालाणू मुरणेयत्वा ॥५८६॥ १-प्रध्यसंग्रह मांचा सं. २२
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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