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________________ सम्यग्शनचयिका भाषाटोका | उक्त च - प्राप्ते व्रते ते तस्ये, चित्तमस्तित्वसंयुतम् । surferent fear तं सम्यक्त्वेन युते नरे । सो सम्यदृष्टी जीव के सर्वज्ञ देव विषै, व्रत विषे, शास्त्र विषै, तत्त्व विषै जैसे ही है असा अस्तित्वभाव करि संयुक्त चिस हो है, सो सम्यक्त्व सहित जीव विष आस्तिक्य गुण है । असें अस्तित्ववादीनि करि कहिए हैं अथवा 'तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्' असा कया है अथवा 'तस्वरुचिः सम्यक्त्वम्' २ असा कया है, सो ए सर्व विशेषण एकार्थ हैं । इति सबनि का अर्थ यह जानना - जो यथार्थ स्वरूप लीएं, पदार्थनि का श्रान, सो सम्यक्त्व है । उक्त च - प्रदेशयात्कायाः प्रका परिच्छेद्यत्तस्तेऽर्थाः तत्त्वं वस्तुस्वरूपतः ॥१॥ अर्थ - सम्यक्त्व के श्रद्धान विषै धावने योग्य जे जीवादिक, ते बहुत प्रदेशनि का प्रचध - समूह को घरें हैं, तातें काय कहिए । बहुरि अपने गुण पर्यायनिक द्रवें हैं, व्यायें हैं, तातें द्रव्य नाम कहिए । बहुरि जीव करि जानने योग्य हैं, तात ग्रंथ कहिए | बहुरि वस्तुस्वरूपपना को घरें हैं, तातें तत्त्व कहिए । असे इनिका सामान्य लक्षण जानना । पति के अधिकार कहैं हैं - छद्दथ्येसु य णामं, उवलक्खरवाय अत्थरणे कालो । अत्थतं संखा, ठारपसरूवं फलं च हवे १५६२।। षद्रव्येषु च नाम, उपलक्षणानुवादः प्रस्तित्वकालः । प्रस्तित्वक्षेत्र संख्या, स्थानस्वरूपं फलं च भवेत् ।। ५६२ ॥ [ exe टीका - षट् द्रव्यनि के वर्णन विषै १ नाम, २. उपलक्षणानुवाद, ३. स्थिति, M ४. क्षेत्र, ५. संख्या, ६ स्थानस्वरूप, ७. फल ए सात अधिकार जानते । १. तत्त्वार्थसूत्र : श्रध्याय १, सूत्र २ । २. धष्टपाहुड : मोक्षपाहुड, गाथा ३८ । 1 I
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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