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________________ मोम्मटसार जीवकाश गाथा ५०७-५०५ MANTRAaminainstitutwancianRRIERRORE ram-farnamannimuanra-wimmisma m - m ai erimurminarpramrem.. स्थान, तातें अनंत गुणवृद्धिरूप यह स्थान जानना । बहुरि कृष्ण लेश्या का जघन्य के समीपवर्ती स्थान, तिस जघन्य स्थान ते अनन्त भाग वृद्धिरूप जानना । जैसे ही अन्य स्थाननि विर्षे वा अन्य लेश्यानि विर्षे वृद्धि का अनुक्रम जानना । बहुरि जो हानि अपेक्षा कथन कीजिए तो कृष्णलेश्या का उत्कृष्ट स्थान ते ताके समीपवर्ती स्थान अनन्त भाग हानि लीए, जानना । बहुरि कृष्ण लेश्या का जघन्य स्थान ते नील लेश्या का उत्कृष्ट स्थान अनन्त मुणहानि लीएं जानना । बहुरि कृष्ण लेश्या का जघन्य के समीपवर्ती स्थान तें जघन्य स्थान अनन्त भाग लीए जानना । असे ही अन्य स्थाननि वि अन्य लेश्यानि विर्षे यंत्र द्वार करि कह्या; अनुक्रम हैं उलटा अनुक्रम लीए हानि का अनुक्रम जानना । असे संक्रमण विर्षे वृद्धि - हानि है । इति संक्रमणाधिकारः। प्रागै कर्माधिकार दोय गाया करि कहै हैंपहिया जे छप्पुरिसा, परिभट्टारणमझदेम्मि । फलभरियरुक्खमेगं, पेक्खित्ता ते विचितंति ॥५०७॥ णि मूलखंधसाहुवसाहं छित्तुं चिणित्तु पडिदाई। खाउं फलाइं इदि जं, मणेण वयणं हवे कम्मं ॥५०८॥जुम्मम्॥ पथिका ये षट्पुरुषाः, परिभ्रष्टा अरण्यमध्यदेशे । फलभरितवृक्षमेक, हष्टवा ते विचिन्तयन्ति ।।५०७॥ निर्मलस्कन्धशाखोपशाखं छित्त्वा चित्वा पतितानि । खादितुं फलानि इति, यन्मनसा वचनं भवेत् कर्म ॥५०८॥ युग्मम् । टीका - कष्णादिक एक - एक लेश्यावाले छह पथिक पुरुष मार्म ते भ्रष्ट भए, तहां वन विर्षे एक फलनि करि भरथा हुवा वृक्ष. कौं देखि, असे चितवै हैं -- कृरण लेश्यावाला तो चितवे हैं, जो मैं इस वृक्ष कौं मूल ते उपाडि, फल खास्यौं । बहुरि नील लेश्यावाला चितवै है, मैं इस वृक्ष के पेड कौं काटि फल खास्यौं । बहुरि कपोत वाला चिंत है, मैं इस वृक्ष की बड़ी शाखानि छेदि फल खास्यौं । बहुरि पीतवाला चितवें है, मैं इस वृक्ष की छोटी शाखानि को छेदि फल खास्यौं । बहरि पद्मवाला चितवं है मैं इस वृक्ष के फलनि हो कौं छेद फल खायौं । शुक्लवाला चितवं हैं कि ARSamaweपानमा
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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