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________________ ५६४ । गोम्मटसार औचकाण्ड गत्या ४८ बहुरि केवलदर्शनी जीवनि का परिमाण केवलज्ञानी जीवनि का परिमाण के समान जानना । सो इनिका प्रमाण ज्ञानमार्गणा विर्षे कहा है । एइंदियपहुक्षीणं, खीणकसायंतणंतरासीणं । जोगो अंचक्खुदंसणजीवाणं होदि परिमाणं ॥४८८॥ एकेंद्रियप्रभुतीनां, क्षोणकषायांतानंतराशीनाम् । योगः प्रचक्षुर्शनजीवाना भवति परिमारणम् ॥४॥ टीका - एकेंद्रिय प्रादि क्षीणकषाय गुणस्थानवर्ती पर्यंत अनंत जीवनि का जोड दीए, जो परिमाण होइ तिलना चक्षुदर्शनी जीवनि का प्रमाण जानना । - - इति प्राचार्य श्रीगेमिवन्द्र विरचित मोम्मटसार द्वितीय नाम पंचसंग्रह 'ग्रंथ की जीवतत्वप्रदीपिका नाम संस्कृत टीका के अनुसारि सम्यग्ज्ञानचंद्रिका नामा भाषाटीका विर्षे जीवको विर्षे : प्ररूपित जे प्रौस प्ररूपणा तिनि विर्षे दर्शनमार्गरणा प्रहपसार है नाम जाका असा । चौदहवां वधिकार संपूर्ण भया ।।१४।। SNA
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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