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________________ । होम्मसार जीवकाण्ड गाया ४७०-४७६ HP - U Raomi ar-EATED टीका - नाम के एक देश ते सर्व नाम का ग्रहण करना, इस न्याय करि इस गाथा का अर्थ कीजिए है । १ दर्शनिक, २ अतिक, ३ सामायिक, ४ प्रोषधोपवास, ५ सचित्तविरत, ६ रात्रिभोजनविरत, ७ ब्रह्मचारी, ८ आरंभविरत, परिग्रह विरत, १० अनुमति विरत, ११ उद्दिष्ट विरत असै ग्यारह प्रतिमा की अपेक्षा देशविरत के ग्यारह भेद जानने । तहां पांच उदुंबरादिक अर सप्त व्यसननि कौं त्याग पर शुद्ध सम्यक्त्वी होइ; सो दर्शनिक कहिए। पंच अणुव्रतादिक कौं धारै, सो बतिक कहिए । नित्य सामायिक क्रिया जाकै होइ; सो सामायिक कहिए । अवश्य पनि विर्षे उपवास जाकै होइ; सो प्रोषधोपवास कहिए । जीव सहित वस्तु सेवन का त्यागी होइ; सो सचित्त विरत कहिए । रात्रि विर्षे भोजन न करें सो रात्रिभक्त विरत कहिए । सदा काल शील पालैं; सो ब्रह्मचारी कहिए । पाप आरंभ कौं त्यागै; सो प्रारंभ विरत कहिए । परिग्रह के कार्य को त्यागें; सो परिग्रह विरत कहिए । पाप की अनुमोदना की त्याग; सो अनुमति विरत कहिए । अपने निमित्त भया आहारादिक कौं त्याग; सो उद्दिष्ट विरत कहिए । इनिका विशेष वर्णन ग्रंथांतर से जानना । जीवा चोद्दस-भेया, इंदिय-विसया तहट्ठवीसं तु । जे तेसु णेव विरया, असंजदा ते मुणेदब्बा ॥४७८॥ जीवाश्चतुर्दशभेदा, इंद्रियविषयास्तथाष्टवितिस्तु । ये तेषु नैव विरता, असंयताः ते मंतव्याः ॥४७८।। टीका - चौदह जीवसमास रूप भेद, बहुरि तैसे ही अट्ठाईस इंद्रियनि के विषय, तिनिविष जे विरत न होंई, जीवनि की दया न करें, विषयनि विर्षे रागी होइ, ते असंयमी जानने । पंच-रस-पंच-वण्णा, दो गंधा अट्ठ-फास-सत्त-सरा। मणसहिवठ्ठावीसा, इंदीयविसया मुरणेदव्वा ॥४७६॥ पंचरसपंचवर्णाः, द्वौ गंधौ प्रष्टस्पर्शसप्तस्वराः । मनःसहिताः अष्टविशतिः इंद्रियविषयाः मंतव्याः ॥४७॥ माया -mommam iimnimuamann १पखंडागम-धवला पुस्तक १, पृष्ठ ३७५, गाथा सं. १६४१
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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