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________________ सम्पानधविका भाषाटोका ] {५२१ भी हो, तो भी सर्व पदार्थनि विषै परोक्ष कहिए अविशद, अस्पष्ट ही है । जातें मूर्तिक पदार्थनि विषै वा सूक्ष्म अर्थ- पर्यायनि विषै वा अन्य सूक्ष्म श्रंशनि विषै विशदा करि प्रवृत्ति श्रुतज्ञान की न हो है । बहुरि जे मूर्तिक व्यंजनपर्याय वा अन्य स्थूल अंश इस ज्ञान के विषय हैं । तिनि विषे भी अवधिज्ञानादि की नाई प्रत्यक्ष रूप न प्रवर्तें है । तातै श्रुतज्ञान परोक्ष है । बहुरि केवलज्ञान प्रत्यक्ष कहिए पदार्थ, स्थूल -- सूक्षा तिथि विशद पर स्पष्टरूप मूर्तिक- अमूर्तिक है जाते समस्त ग्रावरण अर वीर्यातराय के क्षय ने प्रकट हो है, तातें प्रत्यक्ष है । अक्ष कहिए श्रात्मा, तिहिं प्रति निश्चित होइ, कोई पर द्रव्य की अपेक्षा न चाहे, सो प्रत्यक्ष कहिए । प्रत्यक्ष का लक्षण विशद वा स्पष्ट है | जहां अपने विषय के जानने मैं कसर न होइ ताक विशद या स्पष्ट कहिए । बहुरि उपात्त वा अनुपात्तरूप पर द्रव्य की सापेक्षा को लीए जो होइ, सो परोक्ष कहिये । याका लक्षरण प्रविशद - अस्पष्ट जानना । मन, नेत्र अनुपात है; अन्य चारि इंद्री उपात्त हैं । श्रुतज्ञान केवलज्ञान विषै प्रत्यक्ष परोक्ष लक्षण भेद से भेद है । बहुरि विषय अपेक्षा समानता है । सोई समंतभद्राचार्य देवागम स्तोत्र विषं कला है स्याद्वावकेवलज्ञाने, सर्वतत्वप्रकाशने । भेदः साक्षादसाक्षाच्च ह्यवस्त्वम्यतमं भवेत् 11 याका अर्थ स्याद्वाद तौ श्रुतज्ञान श्रर केवलज्ञान ए दोऊ सर्व तत्त्व के प्रकाशी हैं, परन्तु प्रत्यक्ष परोक्ष भेद तें भेद पाइए हैं । इनि दोऊ प्रमाणनि विषे अन्य तम जो एक, सो वस्तु है। एक का प्रभाव मानें दोऊनि का अभाव - विनाश जाना । - ari शास्त्रकर्ता पैसठ गाथानि करि अवधिज्ञान की प्ररूप हैं श्रवयदि ति ओही, सीमाणाणे त्ति वण्णियं समये । भवगुणपच्चयविहियं, जमोहिणारणो त्ति रखं बेंति ॥३७०॥२ १. पाठभेद - जमोहि तमोहि । २. पडागम - वला पुस्तक १, गावा सं. १८४ पृष्ठ ३६१ ।
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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