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________________ ‌ ૬ ] fire fast ६६ हो, तर गुणिए, जो प्रमाण होइ, तार्कों जितनी बार संकलन कारें, तामें एक जोड, जो प्रमाण होइ, ताका भांग दीजिए, जो लब्ध होई, तामें मुख जो पहिला स्थान का प्रमाण सो जोड़िए; जो प्रमाण होइ, ara जितनी बार संकलन का होई तितनी जायगा गच्छ तें लगाइ, एक एक बंधता अंक मांडि, परस्पर गुण, जो प्रमाण होइ, सो तौ भाज्य । पर एक सैं लगाई एक एक बघता अंक मांडि, परस्पर गुरौं, जो प्रमाण होइ, सो भागहार । तहां भाज्य कौं भागहार का भांग दीएं, जो लब्धराशि होइ, ताकरि गरिए, असें करतें समस्त विवक्षित बार संकलन वन आ है । समच्छेद करि मिलाएं, । सो तामें एक प्रावि हां उदाहरण कहिए है - जैसे छठा पर्यासमास का भेद विषै च्यारि घाटि गच्छ का जो दोय, ताका व्यारि बार संकलन धनमात्र चूणि कहिए । सो इहाँ गच्छ दोय, तामें एक घटाएं, एक यार्कों एक बारादि संकलन धन रचना अपेक्षा दोय बार आदि संकलन की रचना उपजै है । सो एक एक बार बंधता संकलन भया, तातें उत्तर का प्रभाग एक, ताकरि गुरौं भी एक ही भया । याक इहां च्यारि बार संकलन कह्या; सो च्यारि में एक मिलाएं, पांच भया, तितिका भाग दीएं एक का पांचवां भाग भया । यामै मुख जो श्रादिका प्रमाण एक सो छह का पांचवां भाग भया । बहार इहां व्यारि बार ह्या एक एक बधता, च्यारि पर्यंत अंक मांड ( ११२/३/४ ) परस्पर गुरौं, चौबीस (२४) भये; सो भागहार, अर गच्छ दोय का प्रमाण तें लगाइ एक एक बता अंक मांडि सौं बोस ( १२० ) भाज्या, सो भाज्य की भागहार ताकरि पूर्वोक्त ग्रह का पांचवां भाग को गुण छह संकलन धन जानना । जैसे ही तीन का तीन बार घटाये दोय उत्तर, एक करि गुणै भी दोय, इहां अधिक बार प्रमाण च्यारि, ताका भाग दीये प्राधा, मैं मुख एक जोडे ड्योढ़ भया । बहुरि एक आदि बार प्रमाण पर्यंत एक एक अधिक अंक (१२/३ ) परस्पर गुर्णे, भागहार छह पर गच्छ आदि एक एक अधिक अंक ( ३|४|५) परस्पर गुणे, भाज्य साठि भाज्य की भागहार का भांग दीए, पाये दश इनिकरि पूर्वोक्त ड्योढ कौं गुणें, छठा भेद विषै तीन घाटि गच्छ का तीन बार संकलन धनमात्र पिशुलिपिशुलि पंद्रह हो है । असें सर्वत्र विवक्षित संकलन धन ल्यावने । (२।३२४४५) परस्पर गुरौं एक का भाग दीयें, लब्धिराशि पांच, भये । सोई दोय का व्यारि बार संकलन धन पीछे गच्छ तीन, एक तीन बार संकलन है । तातें एक बहुरि संस्कृत टीकाकार केशव अपने अभिप्राय करि तिनि प्रक्षेपक प्रक्षेपका का प्रमाण ल्यावने निमित दोय गाथारूप करण सूत्र कहैं हैं I
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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