SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 287
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २५२] [ गोम्मटसार अवकाण्ड गाथा १३६-१३७ संज्ञा हो है । हार कहिए अन्नादिक, तौहिविषै संज्ञा कहिए वांछा, सो श्राहार संज्ञा जाननी | श्रागें भय संज्ञा उपजने के कारण कहे हैं। अइभीमदंसरषेण य, तस्सुवजोगेण ओमससीए । भयकम्मुदीरणाए, भयसण्णा जायदे चदुहिं ॥१३६॥ प्रतिभीमदर्शनेन च तस्योपयोगेन अवमसत्वेन । reenबीररया, भयसंज्ञा जायते चतुभिः ।। १३६ ।। टीका - अतिभयकारी व्याघ्र आदि वा क्रूर मृगादिक वा भूतादिक का देखना वा उनकी कथादिक का सुनना, उनकी यादि करना इत्यादिक उपयोग का होना, बहुरि अपनी हीन शक्ति का होना ए तो बाह्य कारण हैं । बहुरि भय नामा नोकषायरूप मोह कर्म, ताका तीव्र उदय होना, यह अंतरंग कारण है । इनि कारणनि करि भय संज्ञा हो है । भय करि भई जो भागि जाना, छिपि जाना इत्यादिक रूप वांछा, सो भय संज्ञा कहिए । मैथुन संज्ञा उपजने के कारण कहै हैं - पणिदरसभोयणेण य, तस्सुवजोगे कुसीलसेवाए । वेदस्सुदीरणाए, मेहुणा हवदि एवं ॥ १३७ ॥ प्रणीतरसभोजनेन च तस्योपयोगे कुशोलसेवया । arrrrrrrrr, मैथुनसंज्ञा भवति एवं ।। १३७ ।। टीका - वृष्य जो कामोत्पादक गरिष्ठ भोजन, ताका खाना पर काम कथा का सुनना र भोगे हुये काम विषयादिक का यादि करना इत्यादिकरूप उपयोग होना, बहुरि कुशीलवान कामी पुरुषनि करि सहित संगति करनी, गोष्ठी करनी ए ती बाह्य कारण हैं । बहुरि स्त्री, पुरुष, नपुंसक वेदनि विषे किसी हो वेदरूप नोकषाय की उदीरणा, सो अंतरंग करण है । इनि कारणनि तें मैथुन संज्ञा हो है । मैथुन जो कामसेवन-रूप स्त्री-पुरुष का युगल संम्बन्धी कर्म, तीहिविषे वांछा, मैथुनसंज्ञा जाननी । आगे परिग्रह संज्ञा उपजने के कारण कहैं हैं - —
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy