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________________ २१८ [ गोम्बटसार जीकाण्ड गाथा १०६ प्रवरपरितासंगवर संगुणिय रुवपरिहोणे । तच्चरिमो रूवजुदे, ताि असंखेज्जगुणपढमं ॥१०६॥ अवरपरीतासंख्येनावरं संगुण्य स्वपरिहोने । तच्चरमो रूपयुते, सस्मिन् असंख्यातगुणप्रथममम् ।।१०।। - टीका - जघन्य परीता असंख्यात करि जघन्य अवगाहना की गुणि, तामैं एक घटाए जो प्रमाण होइ,. तितने प्रदेशरूप -तिस प्रवक्तव्य गुरग वृद्धि का अन्त अवगाहना स्थान हो है । ए प्रवक्तव्यं गुस्स. वृद्धि के स्थान केते हैं ! सो कहिए है - पूर्ववत् प्रावो अंते सुवः' इत्यादि सूत्र करि याका प्रादि को अंत विर्षे घटाए, अवशेष कौं वृद्धि एक का भाग देइ एक जोडे, जितने होइ तितने हैं। बहुरि इहां प्रवक्तव्य गुण वृद्धि का स्वरूप अंकसंदृष्टि करि अबलोकिए हैं। जैसे जघन्य अवगाहना का प्रमाण सोलह (१६), एक घाटि जवन्य परीता असंख्यात प्रभारण जो उत्कृष्ट संस्थात, ताका प्रमाण तोन, ताकरि जघन्य कौं गुणें अडसालोस होइ । बहुरि जघन्य परिमित असंख्यात का प्रमाण च्यारि, ताकरि जघन्य कौं गणे चौंसठ होइ, इनिके बीचि जे भेद, ते प्रवक्तव्य गुण वृद्धि के स्थान हैं। जाते इनि को संख्यात था असंख्यात गुण वृद्धि रूप कहे न जाइ, सहां जघन्य अवगाहन सोलह कौ एक पाटि परीता संख्यात तीन करि गुण अडतालोस होइ, तामें एक जोडें प्रवक्तव्य गुण वृद्धि का प्रथम स्थान हो है। योकों जघन्य अवगाहन सोलह का भाग दीए पाया गुणचास का सोलहवां भाग प्रमाण प्रवक्तव्य गुण वृद्धि का प्रथम स्थान ल्यावने कौं गुणकार हो है । याकरि जघन्य अवगाहन' कौं गुणि अपवर्तन कीए प्रवक्तव्य गुण वृद्धि का प्रथम अवगाहन स्थान गुणचास प्रदेश प्रमाण हो है। अथवा अवक्तव्य गुण वृद्धि का प्रथम स्थान एक अधिक तिमु सोलह, ताकी जघन्य अवगाहना सोलह, ताका भाग देख पाया एक सोलहवां भाग अधिक तीन, ताकरि जघन्य अवगाहन सोलह कौं गुणं गुणचास पाए, तितने ही प्रदेश प्रमाण अबक्तव्य गुण वृद्धि का प्रथम अवगाहन स्थान हो हैं। जैसे अन्य उत्तरोत्तर भेदनि-वि भी गुणकार का अनुक्रम जानना । तहां प्रबक्तव्य गुण. वृद्धि का अंत का अवगाहना स्थान, सो जघन्य अवमाहन सोलह कौं जघन्य . परिमिता संख्यात ज्यारि करि गुण जो पाया, तामें एक घटाए तरेसटि होइ, सो इतने प्रदेश प्रमाण हैं। बहुरि याकों जघन्य अवगाहन सोलह का भाग देइ, पापा तरेसठि का सोलहवां भाग, सोइ प्रवक्तव्य गुण वृद्धि का BaadiwasoamitrayeEHARSon
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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