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________________ १६४ ] [ गोम्मटसार जोरकाण्ड गाथा ८५-८६ धरे, सो अंड तीहि विषै उपज्या जो जीव, सो अंडज कहिए । इति पोतजरायुज ही जनम का भेद जानना । अंड के बहुरि च्यारि प्रकार देव र धम्मादि विषै उपजे नारकी, तिनिके उपपाद ही जन्म का भेद है । इन कहे जीवति बिना अन्य सर्व एकेंद्री, बेंद्री, तेंद्री, चौद्री श्रर केई पचेंद्री तिर्यञ्च र लब्धि अपर्याप्तक मनुष्य, इनिकैं सम्मूर्छन ही जन्म का भेद पाइए है; असा सिद्धांत विषे कहा है । गे सचित्तादि योनिभेदनि का सम्मूर्छनादि जन्मभेद विषै संभवपना, असंभवना गाथा तीन करि दिखावै हैं - उववादे श्रचितं, गभे मिस्सं तु होदि सम्मुछे । सच्चित च्चित्त, मिस्सं च य होदि जोणी हु ॥८५॥ उपवादे अचित्ता, गर्भे मिश्रा तु भवति संमूच्छे चिसा चित्ता, मिश्रा च च भवति योनिहि ॥८५॥ टीका देव, नारकी संबंधी जो उपपाद जन्म का भेद, तींहिविषं श्रचित ही योनि हैं। वहां योनिरूप पुद्गल स्कंध सर्व चित्त ही हैं । गर्भजन्म का भेदरूप सचित, प्रचित्त दोऊरूप मिश्र ही पुद्गल स्कंघरूप योनि है । तहां योनिरूप पुद्गल स्कंध विषै कोई पुद्गल सवित हैं, कोई अचित्त हैं । बहुरि सम्मूर्छन जन्म विषै सचित, चित्त, मिश्र ए तीन प्रकार योनि पाइए हैं। कहीं योनिरूप पुद्गल स्कंध सचित्त ही हैं, कहीं अति ही हैं, कहीं मिश्र हैं । उववादे सोसणं, सेसे सोदूसरा मिस्तयं होदि । raatarra य संउड वियलेसु विउलं तु ॥८६॥ उपपादे शीतोष्णं, शेषे शीतोष्णमिश्रका भवंति । काक्षेषु च संवृता विकलेषु विवृता तु ॥ ८६ ॥
SR No.090410
Book TitleSamyaggyanchandrika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashpal Jain
PublisherKundkund Kahan Digambar Jain Trust
Publication Year
Total Pages873
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size28 MB
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