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________________ 180 सम्मइसुत्तं द्रव्य हैं। जीव एक चेतन द्रव्य है और घड़ा अचेतन है। दोनों में परस्पर विरोधी धर्म रहते हैं। एक ही वस्तु में परस्पर विरुद्ध धर्म पाये जाते हैं। अनेकान्त इनका विरोध न कर समर्थन करता है। प्रत्येक द्रव्य अखण्ड गुणों का पिण्ड है। गय्य में उपलब्ध होने वाले गुण-धर्म परस्पर विरोधी भी होते हैं। जैसे कि वृक्ष, पत्थर आदि शीतल होने पर भी अग्नि युक्त होते हैं। परन्तु परस्पर विरोधी गुण-धर्मो को अविरोधी सिद्ध करना ही अनेकान्त का कार्य है। उप्पाओ दुवियप्पो' पओगजणिओ य वीससा चेव । तत्थ उ पओगजणिओ समुदयवाओ अपरिसुद्धो' ॥32॥ उत्पादो द्विविकल्पः प्रयोगजनितश्च विनसा चैव। तत्र तु प्रयोगजनितः समुदयवादो अपरिशुद्धः ॥32॥ शब्दार्थ-उप्याओ-उत्पाद: दुयियप्पो-दो प्रकार (का है); पओगजणिओ-प्रयोगजन्य; य-और, यीससा-विससा (स्वाभाविक); चेव-ही; तत्थ उ-उसमें तो पओगजणिओ-प्रयलजन्य (तो) समुदयवाओ-समुदायवाद (नाम याला है और); अपरिसुद्धो-अपरिशुद्ध (भी है)। उत्पाद के प्रकार : भावार्थ उत्पाद दो प्रकार का है-प्रयोगजन्य तथा स्वाभाविक। इनमें से प्रयोगजन्य उत्पाद को समुदायवाद भी कहते हैं, जिसका दूसरा नाम अपरिशुद्ध है। उत्पाद और विनाश केवल प्रयत्नजन्य ही नहीं, अप्रयत्नजन्य भी होते हैं। जो उत्पाद प्रयत्नजन्य होता है, वह उत्पाद प्रायोगिक कहा जाता है; जैसे-मिट्टी के घड़े का उत्पन्न होना। घड़े की रचना कुम्हार के प्रयत्न से होती है, इसलिए घड़े की उत्पत्ति प्रायोगिक कही जाती है। यह अपरिशुद्ध इसलिए कहा गया है कि इस तरह का उत्पाद किसी विशेष द्रव्य के आश्रित नहीं रहता है। यह प्रायोगिक उत्पाद मूर्त व पौगलिक द्रव्यों में ही घटता है; अमूर्त द्रव्यों में नहीं होता। आकाश में उठने वाले मेघ तरह-तरह के रूप धारण करते हैं। मेघों में दृष्टिगोचर होने वाले विभिन्न आकार-प्रकार की कोई रचना करने वाला नहीं है। इसलिए उनकी रूप-रचना अप्रयत्नजन्य होने से स्वाभाविक उत्पाद रूप मानी जाती है। प्रयत्नजन्य उत्पाद का दूसरा नाम समुदायवाद भी है। बालू-रेत आदि के बिखरे हुए कणों के एकत्र होने पर स्कन्ध रूप रचना को प्रयलजन्य समुदाय उत्पाद कहते हैं। 1. दुबिगप्पो। 2. ब बिस्ससा। १. व उबमोगणियो समुदवजणिऔ अ थिरसद्धो।
SR No.090409
Book TitleSammaisuttam
Original Sutra AuthorSiddhasen Divakarsuri
AuthorDevendra Kumar Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages131
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size2 MB
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