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________________ सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार प्रशमरसमितः सर्वकालं पिबंतु ॥२३३॥ इतः पदार्थप्रथनावगुंठनाद् विना कृते रेकमनाकुलं ज्वलत् । समस्तवस्तुव्यतिरेकनिश्चयात् विवेचित ज्ञानमिहावतिष्ठते ॥२३४।। ।।३८७.३८६।। अवबोधने, विद झाने, मुण ज्ञाने, अभि उब इ गती। प्रातिपदिक-- शास्त्र, ज्ञान, न, यत्, शास्त्र, न, क्रियावोंके परिहार कर निष्कर्म ज्ञानमात्र प्रात्माका प्राश्रय रहना चाहिये । ५-प्रज्ञानचेतनाका विध्वंस करनेके लिये समस्तकर्मफलोंके भोगनेका परिहार करके केवल ज्ञानानन्द स्वभावमात्र प्रात्माका संचेतन होना चाहिये । -ज्ञानमात्र संचेतनके अलावा जो भी क्रियायें हुई उन्हें मिथ्या जानना चाहिये अर्थात् मेरे स्वरूप में वे क्रियायें नहीं थी, किन्तु संयोगप्रसंगमें हुई थी ऐसा जानना चाहिये । १०- मैं सर्वक्रियावोंसे विविक्त हूं ऐसा जानकर निष्कर्म ज्ञान मात्र स्वभावमें उपयोग रमाना चाहिये । ११- मैं अपने अचल चैतन्यस्वरूपका संचेतन करता हूं, उदित कर्मफलका प्रतिफलन पाता है तो मेरे भोगे बिना ही उस सब कर्मफलको निकल जाने दो। १२.. मेरा समस्त अनन्तकाल चैतन्यस्वरूपके आश्रयमें ही बीते । १३- कर्मविषवृक्षके फलको न भोगकर स्वसंचेतनमें तृप्त रहनेसे वर्तमान में व सदा भविष्यमें शान्ति रहना निर्बाध है। सिद्धान्त-१-ज्ञानमात्र प्रात्माका ज्ञानरूपसे संचेतन करना प्रात्माका स्वभाव परिएमन है । २-- ज्ञानमात्र प्रात्माका मोह राग-द्वेषादि अज्ञानमय भावोंरूप संवेदन करना विभाव परिणमन है। दृष्टि-१-शुद्धनिश्चयनय (४६) । २-अशुद्धनिश्चयनय (४७) । प्रयोग--कर्मचेतना व कर्मफल चेतनाका त्याग करके ज्ञानमात्र अपने प्रापको निरखते रहना ॥३८७-३८६।। अब ज्ञानकी परविविक्तता गाथानोंमें कहते हैं-[शास्त्रं] शास्त्र [जानं न भवति ज्ञान नहीं है [यस्मात्] क्योंकि [शास्त्रं किंचित् न जानाति] शास्त्र कुछ जानता नहीं है [तस्मात्] इस कारण [जिनाः] जिन भगवान [ज्ञानं अन्यत्] ज्ञानको अन्य [अन्यत् शास्त्र] व शास्त्रको अन्य [विति] कहते हैं। [शब्दः ज्ञानं न भवति] शब्द ज्ञान नहीं है [यस्मात्] मयोंकि [शब्दः किंचित् न जानाति] शब्द कुछ जानता नहीं है [तस्मात्] इस कारण [जिनाः] जिनदेव [शानं अन्यत्] ज्ञानको अन्य व [शब्दं अन्य] शब्दको अन्य [विदन्ति] कहते हैं । [रूपं ज्ञानं न भवति] रूप ज्ञान नहीं है [यस्मात] क्योंकि [रूपं किंचित् न जानाति] रूप कुछ जानता नहीं है [तस्मात्] इस कारण [जिनाः] जिनदेव [शानं अन्यत्] जानको अन्य व [रूपं अन्यत्] रूपको अन्य [विति] कहते हैं । [वर्णः ज्ञानं न भवति] वर्ण ज्ञान नहीं है [यस्मात्]
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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