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________________ सर्व विशुद्धज्ञानाधिकार नमात्मानमेव संत नाहं केवलदर्शनावरणीयकर्मफलं भुंजे चैतन्यात्मानमात्मानमेव संचेतये || नाहं निद्रादर्शनावरणीयकर्मफलं भुजे चैतन्यात्मानमात्मानमेव संचेतये | १० | नाहं निद्रानिद्रादर्शनावरणीय कर्मफलं भुजे चैतन्यात्मानमात्मानमेव संचेतये | ११ | नाहं प्रचलादर्शनावरणीयकर्मफलं भुजे चैतन्यात्मानमात्मानमेव संचेतये | १२ | नाहं प्रचलाप्रचलादर्शनावरणीयकर्मफलं भुंजे चैतन्यात्मानमात्मानमेव संचेतये | १३ नाहं त्यानगृद्धिदर्शनावर सोपकर्मफलं भुंजे चैतन्यात्मानमात्मानमेत्र संचेतये | १४| नाहं सातावेदनीय कर्मफलं भुजे चैतन्यात्मानमात्मानमेव संचेतये | १५ | नाहमसातावेदनीयकर्मफलं भुजे येतन्यात्मानमात्मानमेव संचेतये | १६ | नाहं सम्यक्त्वमोहनीय कर्मफलं भुजे चैतन्यात्मानमात्मानमेव संचेतये | १७| नाहं मिथ्यात्वमोहनीयकर्मफलं भुंजे चैतन्यात्मानमात्मानमेव संचेतये | १८| नाहं सम्यक्त्वमिथ्यात्वमोहनीय कर्मवचन । दुहिदो दुःखितः प्रथमा एकवचन । य च - अव्यय । वदि भवति - वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन मैं अपने चैतन्यस्वरूप श्रात्मामें लीन होता हुग्रा उसका ज्ञाता द्रष्टा ही होऊं । यहाँ यह जानना कि अविरत देशविरत तथा प्रमत्तसंयत दशामें ऐसा ज्ञान श्रद्धान हो प्रधान है और जब जीव श्रप्रमत्त दशाको प्राप्त होकर श्रेणी चढ़ता है तब यह अनुभव साक्षात् होता है । मैं ( ज्ञानरत ) मतिज्ञानावरणीय कर्मके फलको नहीं भोगता, चैतन्यस्वरूप आत्माका ही संचेतन करता हूँ अर्थात् एकाग्रता अनुभव करता हूँ |१1 में श्रुतज्ञानावरणीय कर्मके फलको नहीं भोगता, चैतन्यस्वरूप आत्माका ही संचेतन करता हूं । २। मैं भवधिज्ञानावरणीय कर्मके०, चैतन्यस्वरूप० । ३ में मन:पर्ययज्ञानावरणीय कर्मके०, चैतन्यस्वरूप० 1४| मैं केवलज्ञानावरणीय कर्मके० चैतन्यस्वरूप० |५| ६२७ 1 मैं क्षुदर्शनावरणीय कर्मके फलको नहीं भोगता, चैतन्यस्वरूप श्रात्माका ही संचेतन करता हूँ | ६| मैं प्रचक्षुदर्शनावरणीय कर्मके, चैतन्य० 1७1 में अवधिदर्शनावरणीय कर्मके ०, चैतन्य० 11 में केवलदर्शनावरणीय कर्मके ०, चैतन्य० 181 मैं निद्रादर्शनावरणीय कर्मके ०, चैतन्य |१०| मैं निद्रानिद्रादर्शनावरणीय कर्मके०, चैतन्य० १११। मैं प्रचला दर्शनावरणीय कर्मके० चैतन्य० | १२| मैं प्रचलाप्रचलादर्शनावरणीय कर्मके० चैतन्य० ११३ में स्त्यानगृद्धिदर्शनावरणीय कर्मके ०, चैतन्य० ॥१४॥ 0 मं सातावेदनीय कर्मके फलको नहीं भोगता, डचैतन्यस्वरूप प्रारमाका हो संचेतन करता हूं | १५ | मैं असातावेदनीय कर्मके०, चैतन्य० | १६ | मैं सम्यक्त्वमोहनीय कर्मके फलको नहीं भोगता, चैतन्यस्वरूप श्रात्माका ही संचेतन करता हूं | १७| मैं मिथ्यात्व मोहनीयकर्मके० | १५ | मैं सम्यक्त्वमिथ्यात्व मोहनीय कर्मके ०
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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