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________________ सर्वविशुद्धज्ञानाधिकार हि मोहवाहिनी शुद्धबोधविधुरांधबुद्धयः ।।२२१॥ ॥ ३७२ ।। तृतीया एकवचन ।। ३७२ ॥ जाता है । ६- कार्य उपादान कारणके सदृश हुमा करते हैं । १०- शब्दादिक बाह्यपदार्थ रागादिके आश्रयभूत कारण अथवा बहिरंग निमित्त कारण हैं, किन्तु उन बाह्य पदार्थोंका धात करनेसे रागादिका विनाश नहीं होता । ११- जो पुरुष मनमें हुए रागादिभावको नहीं जानता वही रामादिके पाश्रयभूत बाह्य शब्दादि विषयोंका घात करनेका संकल्प करता है, वहाँ चित्तस्य रागादिको मिटानेका उपाय नहीं बनता । १२- चित्तस्थ रागादिको मिटानेका उपाय अविकार सहज चैतन्यस्वभावका अवलम्बन है । __ सिद्धान्त-१- परद्रव्यके गुण पर्याय प्रात्मामें नहीं हो सकते । २- प्रात्मा अपने स्वरूपकी सुध छोड़कर व्यर्थ विकल्परूप परिणमता है। दृष्टि-१- परद्रव्यादिग्राहक द्रव्यापिकाय (२९) । २.- अशुद्धनिश्चयनय (४७) । प्रयोग- अपने स्वरूपकी बेसुधीको रागादिका मूल जानकर अपनी सुध करके परभाव के असहयोग व स्वरूपके सत्याग्रह द्वारा अन्तस्तत्वमें उपयोगको रमाना ।। ३७२ ॥ अब जो स्पर्श-रस-गंध-वर्ण-शब्दरूप पुद्गल परिणत होते हैं वे यद्यपि इन्द्रियोंसे मात्माके जानने में आते हैं तो भी ये जड़ है, आत्माको यह नहीं कहते कि हमको ग्रहण करो। प्रात्मा ही अमानो होकर उनको भले बुरे मानकर रागी-द्वेषी होता है यह तथ्य गाथामें कहते हैं--[पुद्गलाः] पुद्गल [बहुकानि] बहुत प्रकारके [निवितसंस्तुतमचनानि] निदा और स्तुतिके वचनरूप [परिणमंति] परिणमते हैं [तानि] उनको [श्रुत्वा] सुनकर [अहं मरिणतः] मुझको कहा है ऐसा मानकर [रुष्यति] अज्ञानी जीव रोष करता है व पुनः] पोर [तुष्यति] संतुष्ट होता है [पुद्गलद्रव्यं] पुद्गलद्रव्य [शम्बत्वपरिणतं] शब्दरूप परिणत हुआ है [तस्य गुरणः] उसका गुण [अन्यः] तुझसे अन्य है [तस्मात्] सो हे अज्ञानी जोव त्वं किंचिदपि न मणितः] तुझको तो कुछ भी नहीं कहा [अबुधः] तू प्रज्ञानी हुमा [कि रुष्यसि] क्यों रोष करता है ? [अशुभः वा शुभः] अशुभ अथवा शुभ [शब्दः] शब्द [स्वां न भरगति इति] तुझको ऐसा नहीं कहता कि [मां शृण] मुझको सुन [च] भौर [श्रोत्रविषयं प्रागतं] श्रोत्रइन्द्रियके विषयको प्राप्त [शम्बं] शन्दको [विनिहीतुं] ग्रहण करनेके लिये [स एव] वह पालमा भो अपने प्रदेशोंको छोड़ [न एति] नहीं जाता । [अशुभ शुभं वा] भशुभ अथवा शुभ [रूपं] रूप त्वां इति न भरगति] तुझको ऐसा नहीं कहता कि [मां पश्य तु मुझको देख [च] और [चक्षुविषयं प्रागतं रूपं] चक्षुइन्द्रियके विषयभूत रूपको [विनि.
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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