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________________ शुअचेतन, परम-पारिणामिक भाव, शुद्धत्रेवना, सर्वविशुद्ध, चिमात्र, चैतन्य, प्रभु, विभु, अद्वैत, विष्णु, ब्रह्मा, परमज्योति और शिव इत्यादि अनेक है। यह समयसार अजर, अमर, अविकार शुद्ध, बुद्ध, नित्य, निरंजन. अपरिणामी,ध्रुव, अचल, एक-शायक-स्वरूप अनंतरसनिर्भर, सहजानन्दमय, चिन्मात्र, सहजसिस, अकलंक, सर्व विशद्ध, जानमात्र, सच्चिदानन्द स्वरूप इत्यादि अनेक द्वार से सम्वेद्य है। वस्तु-व्यवस्था - समयसारके विशद परिज्ञानका उपाय भेद-विज्ञान है। अनेक पदार्थोको स्वस्व लक्षणोंसे पृथक-पृथक नियत कर देना और उनमें से उपादेय पदार्थको लक्षित और उससे समस्त पदार्थों को उपेक्षित कर देने को भेद-विज्ञान कहते हैं । प्रकृत भेद-विज्ञान के लिए आत्म-अनात्मस्वरूप समस्त पदाथोंका जान लेना प्रथम आवश्यक है। इस जानकारीके लिए समस्त पदार्थ कितने है यह जानना आवश्यक है। इस जानकारीके लिये आखिर एक पदार्थ होता कितना है यह भी जानना आवश्यक है। एक परिणमन जितने पूरेमें होना ही पड़े और जितने से बाहर त्रिकाल में भी कभी न हो सके, उतनेको एक पदार्थ कहते हैं । जैसे-विचार, सुख, दुख, अनुभव आदि कोई परिणमन मेरा, केवल मेरे आत्मामें, द वह भी समस्त प्रदेशों में होता है और मेरे आत्म-प्रदेशोंसे बाहर अन्यत्र कभी नहीं हो सकता। इसलिए यह में आत्मा एक पदार्थ हूं। इसी प्रकार सब आत्मा हैं। इस तरह विश्व में अक्षय अनन्तानन्त आत्मा हैं। दृश्यमान स्कंधों में जो कुछ दीखता है वह एक एक नहीं है: क्योंकि जलनेसे या अन्य हेतुओंसे या समय व्यतीत होने से उस एक पिण्डमें एक जगह तो रूप-परिवर्तन और तरह देखा जाता है। किन्तु वह परिवर्तन सर्वत्र नहीं होता। इसी प्रकार रस, गन्ध, स्पर्श में भी विविधता देखी जाती है। एक पदार्थका जो लक्षण है उसके अनुसार यह निर्णीत होता है कि इन पिण्डों में एक एक परमाणु करके अनन्त परमाणु हैं और वे एक-एक द्रव्य हैं। क्योंकि एक पदार्थ का लक्षण इनमें घटित हो जाता है। इस तरह जब दृश्यमान छोटे से पिण्डमें अनन्त परमाणु है सब समस्त विश्व में तो अक्षय अनन्तानंत परमाणु है। यह सुसिद्ध बात है । इन परमाणुओं को पुद्गल कहते हैं। क्योंकि इनमें पूर पूर कर एक पिण्ड होनेकी व गल-गलकर पुनः बिखरने की योग्यता है। अनन्तानन्त जीव व अन्तानन्त पुद्गलद्रव्यों के चलने में जो उदासीन सहायक द्रव्य है, वह धर्मद्रव्य है, और वह एक है । अनन्नानन्त जीव व अनन्तानन्त पुद्गलद्रव्य के चमकर ठहरने में जो उदासीन सहायक द्रव्य है, वह अधर्म द्रव्य है, बह भी एक है । समस्त जीव व पुद्गल, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य आदि समस्त द्रश्यों के अवगाह का जो उदासीन हेतु है ऐसा आकाश एक द्रव्य है। इन सबके परिणमनका जो उदासीन हेतुरूप है वह काल द्रक काल दव्य असंख्यात है। वे सोकाकाश (जितने बाकाशमें सब प्रध्य है) के एक एक प्रदेशपर एक एक स्थित है। आकास बप एक है। इस प्रकार अनन्तानन्त आत्मा, अनन्तानन्त पुद्गल, एक धर्म द्रव्य, एक अधर्म दव्य, एक आकाश द्रव्य व असंख्पात काल द्रव्य ऐसे अनन्तानन्त पदार्थ है। समयसारके परिज्ञानके लिए अब अनन्तामन्त पदार्थो में से एक आत्मा स्वके रूपमें और अवशिष्ट अन्य अनन्तानन्त आत्मा, अनन्तानन्त पुद्गल, एक धर्म द्रव्य, एक अधर्म द्रव्य एक आकाश द्रव्य, असंख्यात काल द्रव्य इन सबको परके रूपमें जानना चाहिये। इसके अनन्तर उस एक आत्मामें भी उन सभी गुण व स गौण करके सनातन एक चैतन्य स्वभाव की दृष्टि करनी चाहिमे । पावश्यक बजातव्य दृष्टियां समयसारके परिजानके लिए समयसार व समयसारसे भिन्न समस्त परभाव का जानना आवश्यक है और आवश्यक है उन समस्ल परभावों से हटकर एक समयसारका ही उपयोग करना । एतदर्थ बह सब परिज्ञान अनेक दृष्टियोंसे आवश्यक होता है । अत: संक्षेपमें आवश्यक दृष्टियोंका वर्णन किया जाता है। इसके पश्चात् समयसार प्रन्थ में वणित विषयोंका संक्षेप सारांश प्रकट किया जायगा । दृष्टिके अपर नाम नय, अभिप्राय, आशय, मत इत्यादि
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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