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________________ समयसार महिमा सभी जीव शाश्वत शान्ति चाहते हैं और एतदर्थ ही भरसक प्रयत्न करते हैं। जो जीव विषय भोगोंग ही आनन्द मानते हैं और विषय भोगों के बाधक निमित्तोंसे ष एवं कलह करके शान्ति प्राप्त करना चाहते हैं, उन जीवोंकी तो इसमें चर्चा ही नहीं करना है। जो अलौकिक उपायोंसे शान्तिका मार्ग हते हैं, उनकी ही कुछ चर्चाओं के बाद परिणामस्वरूप हितकर प्रकृत बातपर आना है। कुछ विवेकी महानुभादोंकी धारणा है:-कि जिस परम ब्रह्म परमेश्वरने अपनी सृष्टि की है उस परम पिता परमात्माकी उपासनासे ही दुःखोंसे मुक्ति हो सकती है। कुछ विवेकी महानुभावोंकी धारा है :-..प्रित लोर पुराना नया होनेने ही लश एवं जन्म-परम्परा हुई है, सो प्रकृति और पुरुषका भेदज्ञान कर लेनेसे हो क्लेश एवं जन्म-परम्परासे मुक्ति मिल सकती है। कुछ विवेकी महानुभावोंकी धारणा है कि :-क्षणिक चित्तवृत्तियों में जो आत्मा मानने का भ्रम है इस बात्मभ्रमसे सारा क्लेश है, सो आत्माका भ्रम समाप्त कर देनेसे ही निर्माण प्राप्त हो सकता है। कुछ विवेकी महानुभावोंकी धारणा है कि :--पारमा तो शाश्वत निर्विकार है। उसमें विकारका जब तक घ्रम है तब तक जीब दुःखी है, विकारका भ्रम समाप्त होनेसे ही जीव शान्ति प्राप्त कर सकता है। कुछ विवेकी महान भावोंकी धारणा है कि:-दुक्रमों से ही जीव सांसारिक यातनाएं सहता है, और याानाओंसे मुक्ति पाना सत्कर्म करने से ही सम्भव है। और कुछ विवेकी महानुभावोंकी धारणा है कि:-विकलात्मक विविध उपयोगोंसे ही जीवका संसार परिभ्रमण चल रहा है। इस भवभ्रमणको निति निर्विकल्प समाधिसे ही हो सकती है। इत्यादि प्रज्ञापूर्ण बनेक धारणाएं हैं। इनमें से किसी भी धारणाको असत्य नहीं कहा जा सकता और यह भी.नहीं कहा जा सकता कि इसमें कोई भी धारणा किसी दूसरेके विरुद्ध है। इन सब धारणाओंका जो लक्ष्य है वह सब है एक 'समयसार"। एक समयसार के पचार्थ परिज्ञानमें उक्त समस्त उपाय गभित है। एक समयसारके परिज्ञानसे उक्त सब उपाय कैसे प्रचलित हो जाते हैं वह बात अभिधेय समयसारके यकिंचित अभियान के पश्चाल कहीं तो विषाद उक्तियोंमें और कहीं फलितार्थ रूपमें प्रकट हो हो जायेंगी । अतः अन्य कोई विस्तृत विवेचन न करके अब समयसारके सम्बन्ध में ही संक्षिप्त प्रकाश डाला जाता है। समयसार का प्रथ समय शब्दके दो अर्थ है:-१-समरत पदार्थ, २-आत्मा। इनमें अर्थात् समस्त पदार्थों में अथवा आत्मा जो सार हो वह समयसार कहलाता है । 'सम्-एकोभावेन स्वगुणपर्यायान् गच्छति' इस निरूपितसे समय शब्दका अर्थ समस्त पदार्थों में घटित होता है; क्योंकि सभी पदार्थ अपने-अपने ही गुण पर्यायौंको प्राप्त हैं। 'सम्-एक्स्वन युगपत् अ गच्छति, जानाति' इस निरुक्तिसे समय शब्दका अर्थ आस्मा होता है, क्योंकि आत्म-पना ही जानने वाला है और उसका स्वभाव सर्व पदार्थोंको एकस्वरूप अर्थात् केवल उसका सत्तारमक बांध एक माथ जानने का है। ___अब सब पदार्थों में सार कहो तो वह आत्मा नामका पदार्थ है और उसमें भी निरपेक्ष, णाश्वत, सहज, एक स्वरूप आत्मस्वभाव (चंतन्य स्वभाव) की दृष्टिले दष्ट आत्म-सस्व सार है। इसी प्रकार दूसरी मिलिसे भी यही समयसार वाच्य है। समयसार के अपर नामब्रह्म, परम-ब्रह्म, परमेश्वर, कारण परमात्मा, जगतपिता, का सार है। इसी प्रकार दूसरी नि
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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