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________________ समयसार - - --- इत्यभ्युपगमः तहि यथोपयोगात्मनो जीवादन्यो जडस्वभावः क्रोधः तथा प्रत्ययनोकर्मकाण्यप्यन्यान्येव जडस्वभावत्वाविशेषान्नास्ति जीवप्रत्यययोरेकत्वं ।। ११३-११५ ॥ एकः । अयं-प्रथमा एकः । एकत्ते...सप्तमी एक० । दोषः-प्रथमा ए० । प्रत्ययनोकर्मकर्मणा-पष्ठी बहु । अथ-अव्यय । ते-पाटी एक० । अन्यः-प्रथमा एक० । क्रोधः-प्रथमा एक० । अन्य:-प्रथमा एक० । उपयोगात्मक:-प्रथमा एक । भवति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन । चेतयिता-प्रथमा एकवचन । यथाअव्यय । क्रोधः-प्र० ए० । तथा अव्यय । प्रत्यया:-प्र० बहु० । कर्म, नोकर्म-प्रथमा एक० । अपि-अव्यय । अन्यत्-प्रथमा एकवचन ।। ११३-११५ ।। सिद्धान्त-१- जीव द्रव्यकर्मोंका कर्ता भोक्ता उपचारसे है । २- जीव भावकाँका कर्ता निश्चयनयाभिमुख व्यवहारसे है । दृष्टि-१- परकर्तृत्व अनुपचरित असद्भूतव्यवहार (१२६) । २-- अशुद्धनिश्चयनय (४७)। प्रयोग-शुद्ध शान्त रहने के लिये जड़क्रोधादिसे ब जड़क्रोधादिके प्रतिफलनसे विविक्त चैतन्यमात्र उपयोगस्वरूप अन्तस्तत्त्वमें अधिष्ठित होना चाहिये ।। ११३-११५ ।।। अब सांख्यमतानुयायी शिष्यके प्रति पुद्गलद्रव्यके परिणामस्वभावपना सिद्ध करते हैं--(यदि पुद्गलद्रव्यं) यदि पुद्गलद्रव्य (जीवे) जीवमें (स्वयं) स्वयं (न बद्ध) नहीं बंधा (कर्मभावेन) कर्मभावसे (स्वयं) स्वयं (न परिणमते) नहीं परिणमन करता है (इ तथा) ऐसा मानो तो यह पुद्गलद्रव्य (अपरिणामि) अपरिणामो (भवति) प्रसक्त होता है (1) और (कामरगवर्गगासु) कार्माणवणाबोंके (कर्मभावेन) कर्मभावसे (अपरिणममानासु) नहीं परिणमनेपर (संसारस्य) संसारका (अभाव:) प्रभाव (प्रसजति) ठहरेगा (या) अथवा (सांख्यसमयः) सांस्य मतका प्रसंग प्रायेगा । (जीयः) यदि जीव हो (पुद्गलद्रध्यागि) पुद्गलद्रव्योंको (कर्मभायेन) कर्मभावसे (परिणामयति) परिणमन कराता है ऐसा माना जाय तो (स्वयं अपरिणममानानि) पाप ही परिणमन न करते (तानि) उन पुद्गलद्रव्योंको (चेतयिता) यह चेतन जीव (कथं नु) कैसे (परिणामयति) परिणमा सकता है, यह प्रश्न हो सकता है (अथ) अथवा (पुद्गलद्रव्य) पुद्गलद्रव्य (स्वयमेव हि) पाप ही (कर्ममावेन) कर्मभावसे (परिगमते) परिणमता है, ऐसा माना जाय तो (जोवः) जीव (कर्म) कर्मरूप पुद्गलको (कर्मत्व) कर्म रूपसे (परिणामयति) परिणमाता है (इति) ऐसा कहना (मिथ्या) भूठ हो जाता है । इसलिये यह सिद्ध हुआ कि (पुद्गलद्रव्य) पुद्गलद्रव्य (कर्मपरिणत) कर्मरूप परिणत हुअा (नियमात चत्र) नियमसे ही (कम) कर्मरूप (भवति) होता है (तथा) ऐसा होनेपर (तच्चय) वह पुद्गल द्रव्य ही (ज्ञानावरणादिपरिणत) ज्ञानावरणादिरूप परिणत (तत्) पुद्गलद्रव्यको (तत् चय)
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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