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________________ २२२ भावेपि प्राप्यं विकार्यं निर्वर्यं च पुद्गलद्रव्यात्मकं कर्म गृह्णाति परिणामयत्युत्पादयति करोति बध्नाति चात्मेति विकल्पः स किलोपचारः ।। १०७ ।। समयसार दाने । पदविवरण उत्पादयति करोति, बध्नाति, परिणामयति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष एकवचन । आत्मा-प्रथमा एकवचन | पुद्गलद्रव्यं द्वितीया एक० । व्यवहारनयस्य पृष्ठी एक० । वक्तव्यं प्रथमा एक. वचन कूदन्त । पर ग्रागमका यह सिद्धान्त वाला व्यवहार बनता है "प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशास्तद्विधयः ।” सिद्धान्त - ( १ ) निमित्तत्व होनेसे आत्मा पुद्गलद्रव्यको करता है यह उपचार किया जाता है । ( २ ) आत्माके योग उपयोगका निमित्त पाकर पुद्गल कामरणवर्गरायें कर्मरूप परिरामती है । दृष्टि - १ - परकर्तृत्व अनुपचरित श्रसद्भूतव्यवहार ( १२ ) । २ - उपाधिसापेक्ष शुद्ध विनय (२) । प्रयोग — वीतरागस्वसंवेदनज्ञानबलसे अविकार ज्ञानस्वभावका अनुभव करके अपने को निर्भर रहने देनेका पोरुष करना ।। १०७ ।। यहाँ होता है कि यह उपचार किस तरहसे है, उसका उत्तर दृष्टांत द्वारा देते हैं - [ यथा ] जैसे [राजा] राजा [दोषगुरगोत्पादकः ] प्रजाके दोष और गुणोंका उत्पन्न करने वाला है [इति] ऐसा [ व्यवहारात् ] व्यवहारसे [प्रापितः ] कहा है [तया ] उसी प्रकार [जोषः ] जीव [ द्रव्यगुणोत्पादक : ] पुद्गल द्रव्य में द्रव्य गुणका उत्पादक है, ऐसा [ व्यवहारात् ] व्यवहारसे [भरितः ] कहा गया है । टीकार्थ -- जैसे प्रजाके व्याप्यव्यापक भावसे स्वभावसे ही उत्पन्न जो गुण और दोष उनमें राजाके व्याप्यव्यापकभावका प्रभाव है तो भी लोक कहते हैं कि गुण दोषका उपजाने वाला राजा है, ऐसा उपचार (व्यवहार) है, उसी प्रकार पुद्गलद्रव्यके व्याप्य व्यापक भावसे ही उत्पन्न गुण, दोषोंमें जीवके व्याप्यव्यापकभावका प्रभाव है तो भी उन गुण दोषोंका उपजाने वाला जीव है, ऐसा उपचार है । भावार्थ- जैसे लोकमें कहते हैं कि जैसा राजा हो, वैसी ही प्रजा होती है, ऐसा कहकर गुण, दोषका कर्ता राजाको कहा जाता है, उसी प्रकार जैसा जीवका विभाव हो उसके अनुसार कर्मबंध होता है ऐसा जानकर पुदगल द्रव्यके गुण दका कर्ता जीवको कहते हैं । जब परमार्थदृष्टिसे विचारो तो यह उपचार है । प्रसंगविवररण – अनन्तरपूर्व गाथामें कहा गया था कि जो कर्मको करता है, बाँधता है आदि कथन व्यवहारनयका वचन है। अब इसी कथनको इस गाथा में उदाहरणपूर्वक प्रसिद्ध किया गया है । तथ्यप्रकाश -- १ - जिस पुरुष में गुण व दोष उत्पन्न होते हैं उस पुरुष में हो वे गुण व
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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