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________________ जीवाजीवाधिकार १२५ जीवस्यैष वर्ण इति व्यवहारतोऽहद्दवानां प्रज्ञापनेपि न निश्चयतो नित्यमेवामूर्तस्वभावस्योपयोगगुणाधिकस्य जीवस्य कश्चिदपि वर्णोस्ति । एवं गंधरसस्पर्शरूपशरीरसंस्थानसंहननरामद्वेषप्रातिपदिक-पथिन्, लोक, व्यवहारिन्, एतत्, पथिन्, न च पथिन्, कश्चित्, तथा, जीव, कर्मन्, नोकर्मन्, वर्ण, जीव, कर्मन्, नोकर्मन्, वर्ण, जीव, एतत्, वर्ण, जिन, व्यवहारतः, उक्त, गंधरसस्पर्शरूप, देह, संस्थान, आदि, यत्, च, सर्व, व्यवहार, च निश्चयद्रष्ट । मुलधातु.. .मुष स्तेये अयादि, दृशिर् अवलोकने, भण शब्दार्थः पथि गती चुरादि । पद विवरण-पथि-सप्तमी एकबचन, मुष्यमाणं-द्वितीया एक० असमाप्तिकी क्रियाके कर्मका विशेषण, दृष्ट्वा असमाप्तिकी क्रिया, लोका:-प्रथमा ब०, भणति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष [जीवस्य] जीवका [एषः वर्णः] यह वर्ण है ऐसा [जिनः] जिनदेवने [व्यवहारतः] व्यय. हारसे [उक्तः] कहा है [एवं] इस प्रकार [गंधरसस्पर्शरूपारिण] गंध, रस, स्पर्श और रूप [देहः संस्थानादयः] देह संस्थान प्रादिक [ये च सर्वे] जो हैं वे सभी [व्यवहारस्य व्यवहारके मतमें हैं, [निश्चयद्रष्टारः] ऐसा निश्चयनयके देखने वाले [व्यपविशति] कहते हैं । तात्पर्य-निश्चयसे जीव अमूर्त है, फिर भी देहादिके रूपादिको देखकर इस जीवका ऐसा रूप है यो व्यवहारसे कहा गया है। टोकार्थ--जैसे मार्ग में प्रस्थित किसी धनिकको लुटता हुआ देखकर धनिकको मागमें स्थिति होनेसे उपचारसे कहा जाता है कि यह मार्ग लुटता है, तथापि निश्चयसे देखा जाय, तो जो प्राकाशके विशेष प्रदेशोंरूप मार्ग है वह तो कोई लुटता नहीं है । उसी प्रकार जीवमें बंधपर्यायसे अवस्थित जो कर्मका और नोकर्मका वणं है उसे देखकर जीवमें स्थित होनेसे उपचारसे जीवका यह वर्ग है, ऐसे व्यवहारसे भगवान परहंत देव प्रज्ञापन करते हैं, प्रकट करते हैं, तो भी निश्चयसे जीव नित्य ही अमूर्तस्वभाव है और उपयोग गुणके कारण अन्य द्रव्यसे अधिक है याने भिन्न है, इसलिये उसके कोई वर्ण नहीं है। इसी प्रकार गंध, रस, स्पर्श, रूप, शरीर, संस्थान, संहनन, राग द्वेष, मोह, प्रत्यय, कर्म, नोकर्म, वर्ग, वर्गणा, स्पर्धक, प्रध्यात्मस्थान, अनुभागस्थान, योगस्थान, बंधस्थान, उदयस्थान, मार्गणास्थान, स्थितिबंधस्थान, संक्लेशस्थान, विशुद्धिस्थान, संयमलब्धिस्थान, जीवस्थान और गुणस्थान-ये सभी व्यवहारसे जीवके हैं ऐसा परहंत देवोंका प्रज्ञापन होनेपर भी निश्चयसे नित्य ही अमूर्त स्व. भाव वाले व उपयोग गुणके कारण अन्यसे भिन्न जीवके ये सब नहीं हैं, क्योंकि इन वर्णादि भावोंके और जीवके तादात्म्यलक्षण सम्बंधका प्रभाव है । मावार्थ-ये जो वर्णसे लेकर गुणस्थानपर्यन्त भाव कहे हैं, वे सिद्धान्तमें जीवके कहे हैं, सो व्यवहारनयसे कहे गये हैं, निश्चयनयसे तो जीवके नहीं हैं। क्योंकि जीव तो परमार्थतः उपयोगस्वरूप है । जहाँ पहले व्यवहारनपको असत्यार्थ कहा था वहाँ ऐसा नहीं समझना कि
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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