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________________ जीवाजीवाधिकार स्थात्मनः पुद्गलद्रव्येण सह परस्परावगाहलक्षणे संबंधे सत्यपि स्वलक्षणभूतोपयोगगुणव्याप्य. तया सर्वद्रव्येभ्योऽधिकत्वेन प्रतीयमानत्वात् अग्नेरुष्णगुणेनेव सह तादात्म्यलक्षणसंबंधाभावान निश्चय येन वर्णादिपुद्गलपरिणामाः जीवस्य संति ।।५७।। न, च, तत्, तु, उपयोगगुणाधिक, यत् । मूलपातु-सन्-बन्ध पल्पने, जा अपयोधर्म, भू सत्ताबा, युजिर योगे । पदविवरण---एतैः-तृतीया बहुवचन, च-अव्यय, सम्बन्धः-प्रथमा एक०, यथा-अव्यय, एव-अव्यय, क्षीरोदक-प्रथमा एक०, ज्ञातभ्यः-प्रथमा एक कृदन्त क्रिया, च-अव्यय, भवंति-वर्तमान लट् अन्य पुरुष बहुवचन, तस्य-षष्ठी एक०, तानि-प्रथमा बहुवचन, तु-अव्यय, उपयोगुणाधिक:-प्रथमा एक०, यस्मात्हेत्वर्थे पंचमी एकवचन ॥५७।। जानेसे इनका भी संबंध संयोग संबंध कहलाता है। ५-वर्णादिकसे तो उपयोग अत्यन्त निराला है। ८-अध्ययसानादिकोसे भी उपयोगस्वरूप प्रात्मा बिल्कूल विलक्षण है । ६संयोग संबंधमें एकको दूसरेका बताना प्रकट उपचार बाला व्यवहार है । १०-क्षणिक तादा. त्म्यमें विभावको अशुद्ध निश्चयन यसे जीवका जो कहा है वह असद्भूतव्यवहार वाले द्रव्यकर्म बंधकी अपेक्षा तारतम्य बताने के लिए कहा है। वस्तुतः परमशुद्धनिश्चयनयकी अपेक्षा तो यह अशुद्धनिश्चयनय भी व्यवहार ही है । ११-शाश्वत सहज तादात्म्य सम्बन्धमें ही वास्तविक स्वरूप जाना जाता है । १२-जीव उपयोगमय है, जीवका उपयोगके साथ शाश्वत सहज तादात्म्य संबंध है । १३-प्रात्माको वर्णादिसे व रागादिसे भिन्नताका परिचय प्रात्माफे उपयोग गुणके जाननेसे हो जाता है अर्थात् प्रात्मा उपयोगस्वरूप हैं और वर्णादिक व रागादिक जड़ स्वरूप है । १४-पारमाका उपयोगले तादात्म्य संबंध है, जैसे अग्निका उष्णतासे तादात्म्य संबंध है । १५-तादात्म्य तो शाश्वत रहता है, अतः उसके साथ संबन्ध शब्द तुक मिलानेके लिए लगाया जाता है । वस्तुतः तादात्म्य कोई संबंध नहीं है, वह तो तन्मय है । १६वर्णादिकका व अध्यवसानादिका, गुणस्यान पर्यन्त इन सब भावोंका जीवके साथ शाश्वत सहज तादात्म्य संबंध नहीं है, प्रतः ये सब भाव जीवके नहीं हैं। सिद्धान्त--१--आत्मा उपयोग (चैतन्य) स्वरूप है । २- शरीरको प्रात्मा कहना उपचार है, क्योंकि एक द्रव्यका अन्य द्रव्य के साथ संयोग सम्बन्ध ही हो सकता है । ३-नैमित्तिक भावोंका उपादानके साथ अशुद्धिकालमें क्षणिक तादात्म्य रहता है। दृष्टि--१- परमशुद्ध निश्चयनय (४४) । २- एकजातिद्रव्ये अन्य जातिद्रव्योपधारक असद्भूत व्यवहार (१०६)। ३- उपाधिसापेक्ष प्रशुद्ध द्रव्यापिकनय (५३) । प्रयोग---पानीसे दूधकी भिन्नताकी तरह शरीरको आत्मासे भिन्न निरखकर ज्ञानमात्र अन्तःस्वरूपमें उपयोग करना ।।५७॥
SR No.090405
Book TitleSamaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
Author
PublisherBharat Varshiya Varni Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year1995
Total Pages723
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Religion
File Size21 MB
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