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________________ franAR मंगलाचरण करते हुए शंथकर्ता ने वीरभु को जमरकार किया है । | यहाँ प्रयुक्त हुआ वीर शब्द अनेकार्थवाची है । यथा - १. चौबीसवें तीर्थकर श्री महावीर स्वामी का एक नाम वीर भी है। 1.वि विशेषणपूर्वक हर गतौ धातु से वीर शब्द निष्पन्न होता है । जो धातु गत्यर्थक होते हैं, वे ज्ञानार्थक भी होते हैं। अतः जो विशिष्ट ज्ञान के (केवलहान के) धारक होते हैं, वे वीर कहलाते हैं। 1. वि यानि विशिष्ट ई यानि लक्ष्मी । वि विशिष्टाई लक्ष्मीः, तां राति | ददातीति वीरः जो विशिष्ट लक्ष्मी को (अन्तरंग लक्ष्मी और बहिरंग लक्ष्मी को ) प्रदान करने वाले हैं उन्हें वीर कहा जाता है। ४. जो कर्मशत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं वे वीर हैं। ५. वकार से चार व रकार से दो अंक लेना चाहिये । अंक हमेशा | | विपरीत गति के धारक होते हैं। अतः वीर शब्द चौबीस तीर्थकरों का भी | बाचक है। कैसे हैं वे वीरशु ? १. जगत्त्रय के गुरु हैं अर्थात् ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक और अधोलोक में निवास करने वाले समस्त जीवों के गुरु हैं। 1. मुक्तिलक्ष्मी के प्रिय हैं अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर चुके हैं। ____ 1. ब्रह्मचर्यरूपी बाण के धारक हैं । कवियों के मतानुसार काम के | पाँच बाण हैं । काम उन बाणों से इतना विक्रमशील बना हुआ है कि वह संसार भर में दुर्जय हो गया है । वीरप्रभु उसे ब्रह्मचर्रा रूपी बाणों के द्वारा विद्ध करते हैं। 1. संसार के दुःखों का हरण करने वाले हैं। संसारी जीव कायिक | वाचिक, मानसिक आदि अनेक दुःखों से सन्तप्त हो रहे हैं परन्तु जो वीरप्रभु के चरणों का सेवक हैं . वे इन समरस्त ढु.खों से मुक्त हो जाते हैं। ५. भव्यजीवों को ज्ञान प्रदान करने वाले हैं । हेयोपादेय के विवेक को हाज कहते हैं अथवा जिसके द्वारा हित की पाप्ति और अहित का परिहार होता है उसे जान कहते है। श्री वीरप्रभु भन्या जीवों को हिताहित | कानि लेते हैं।
SR No.090403
Book TitleSajjanachittvallabh
Original Sutra AuthorMallishenacharya
AuthorSuvidhisagar Maharaj
PublisherBharatkumar Indarchand Papdiwal
Publication Year
Total Pages58
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Sermon
File Size1 MB
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