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________________ रयासार २३ अन्वयार्थ—इस { भरहे ) भरतक्षेत्र में (दुस्सम याले ) दुःखमा पञ्चमकाल में( मणुयाणं ) मनुष्यों के ( सम्म-विसोही ) सम्यक्त्व की विशुद्धि ( तव-गुण-चारित-सण्णाण-दाण-परिहीणं ) तप, गुण, चारित्र, सम्यक्ज्ञान, दान में परिहीनता ( णियदं ) निश्चित ही ( जायदे ) होती है। अर्थ- इस भरत क्षेत्र में दुःखभा पञ्चमकाल मे मनुष्यो के सम्यक्त्व की विशुद्धि तप, गुण, मूलगुण, उत्तरगुण, सम्यक्चारित्र, सम्यग्ज्ञान व दान में द्रव्य-क्षेत्र-काल भाव की अपेक्षा हीनता नियम से होती है । अर्थात् इस पंचम काल का ऐसा ही प्रभाव है कि इस समय भरत-क्षेत्र में क्षायिक सम्यकदृष्टि, तपस्वी, मूलगुणों के व उत्तरगुणों के पूर्ण धारक/पालक व सम्यक्चारित्र/ चारित्र ज्ञान और सुपात्र दान इनमें परिहीनता नियम से देखी जाती है। दुर्गति का पात्र कौन ? णहि दाणं णहि पूया णहि सीलं णहि गुणं ण चारित्तं । जेजइणा भणिया तेणेरइया होति कुमाणुसा तिरिया ।।३९।। अन्वयार्थ—(जे ) जो मनुष्य ( णहि ) न ही ( दाणं ) दान देते हैं ( गहि ) न ही ( पूया ) पूजा करते हैं ( गाहिं ) न ही ( सीलं ) शील पालते हैं (पहि ) न ही ( गुण ) मूलगुण धारण करते हैं और ( न ) ( चारितं ) चारित्र पालन करते हैं ( ते ) वे मनुष्य (णेरइया ) नारकी ( कुमाणुसा ) कुमानुष और ( तिरिया ) तिर्यच ( होति ) होते हैं-ऐसा ( जइणा ) जिनदेव ने ( भणिया ) कहा है । ___अर्थ—जो मनुष्य न तो दान देते हैं, न ही पूजा करते हैं, न ही शील पालते हैं, न ही गुण धारण करते हैं और न चारित्र आचरण करते हैं, वे मनुष्य नारकी, कुमानुष और तिर्यंच होते हैं-ऐसा जिनदेव ने कहा है । ___भावार्थ मानव पर्याय की दुर्लभता को जानकर प्रत्येक मानव का कर्तव्य है कि वह जीवन में पूजा-दान, शील, गुण और चारित्र का आचरण शक्ति अनुसार अवश्य करे 1 यदि नहीं करता है तो उसे दुर्गति का पात्र अवश्य बनना पड़ेगा।
SR No.090400
Book TitleRayansar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorSyadvatvati Mata
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages142
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, Ethics, & Religion
File Size3 MB
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