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________________ १२४ रयणसार सम्यकदर्शन रूपी रत्न दीपक मिच्छंधयार-रहियं हिय-मज्झमिव सम्म-रयण-दीव कलावं । जो पज्जलइ स दीसइ सम्मं लोयत्तयं जिणुदिटुं ।।१६।। अन्वयार्थ---( मिच्वंगार-रहियं : मिथ्याजली का से रहित, हुआ ( जो ) जो भव्यात्मा ( हिय-मज्झमिव ) हृदय के मध्य में ( सम्म-रयण-दीव-कलावं ) सम्यक्त्व रत्न रूपी दीपक को ( पज्जलइ ) प्रज्वलित करता है ( स ) वह ( सम्म ) समीचीन प्रकार से ( लोयत्तयं ) तीन लोक को ( दीसइ ) देखता है । ___अर्थ-जो भव्यात्मा मिथ्यात्वरूपी अंधकार को अपने आत्मा से दूर हटाकर अपने हृदयरूपी मंदिर के भीतर सम्यक्त्व रत्न रूपी दीपक को जलाता है/प्रज्वलित करता है, वह समीचीन प्रकार से तीन लोक को देखता है । अर्थात् वह सम्यग्दर्शन रूपी दीपक के साथ ज्ञान और चारित्ररूपी रत्नमयी दीपकों के द्वारा अपनी आत्मा को प्रकाशमान करता हुआ केवलज्ञान रूपी सूर्य के प्रकाश को प्राप्त करता है; तभी तीन लोक के पदार्थों को अच्छी तरह देखता है । तात्पर्य है कि सम्यग्दृष्टि जीव ही केवलज्ञान ज्योति को प्राप्त कर लोकत्रय को देखता है । जिनेन्द्रवचनों का अभ्यास मोक्ष का हेतु पवयण-सारन्भासं परमप्प-झाण-कारणं जाण । कम्मक्खवण-णिमित्तं, कम्मक्खवणे हि मोक्खसुहं ।।१६।। अन्वयार्थ ( पवयण-सारभार्स ) जिनेन्द्र कथित वचनों का/ श्रुत का अभ्यास ( परमप्प-ज्झाण-कारणं जाण ) परमात्मा के ध्यान का कारण जानो । परमात्मा का ध्यान ( कम्मक्खवण-णिमित्तं ) कर्मक्षय का निमित्त है ( कम्मक्खवणे हि ) कर्मों का क्षय होने पर निश्चय ही ( मॉक्खसुहं ) मोक्ष-सुख की प्राप्ति होती है। ___ अर्थ-हे भव्यात्माओं ! वीतराग-सर्वज्ञ हितोपदेशी शिवंकर जिनेन्द्र देव के श्रेष्ठ वचन द्वादशांग श्रुत का अभ्यास करो। श्रुत के अभ्यास से आत्म
SR No.090400
Book TitleRayansar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorSyadvatvati Mata
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages142
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Sermon, Ethics, & Religion
File Size3 MB
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