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________________ १०५० ] [ ग्रन्थ सूची-पंचम भाग ८०५. गुटका सं०४ । पत्रसं० १६० । भाषा-हिन्दी । ले०काल्न स१६२६ । पुर्ण 1 वेष्टन सं० २७४ । विशेष-७५ पाठों का संग्रह है जिनमें अधिक स्तोत्र संग्रह हैं 1 कुछ विनती तथा साधारण कक्षाएँ हैं। कुछ उल्लेखनीय पाठ निम्न प्रकार हैं। १. कलियुग कथा...-रचयिता, पाटे केशव, जान भूषण के उपदेश से । भाषा हिन्दी पद्य । २. कर्म हिडालना-रचयिता-हर्षकीति । भाषा-हिन्दी पद्य । पद साधो छोडों कुमति अवेली, जाके मिथ्या संग सहेली। साधो लीज्यो मुमति अकेली, जाके समता संग सहेली। यह सात नरक....... यह अभयदायक ||१|| यह आगे कोध यह दररान निरमल जिन भाषित धर्म अपराने ।।२।। यह मौत तनो व्यवहार चित चैती ज्ञान संभार । यह कवल कीरति गति भाव भघि जीवन के मन भाव। पत्र १४७ मालीरासा भन तरू सींच हो मालिया, तिह चरु चारु मुढाल । चिई हाली फल जय जवर, ते फल रात्रय काल रे । प्रानी त काहे न चेत रे ॥शा काल कहै मुनि मालिया, सींच जु माया गवार । देखतही को होठा होड है, मीतर नहीं कुछ सार रे।। काया कारी हो कन करे बीज सुदेशन नोप । सील सुकरना मालिया, धरम कुरो होम रे प्राणी । गहि वैराग कुदाल की, खोदि सुचारत कूप । भाव रहट वृत्त बोलि छट कांधे त जूपरे ।।१७।। धरम महा तरु विरघ सो, बहु विस्तार करेप । अविनामी सुख कारने, मोख महाफल देव रे । कहै जिनवास सुराखियो हसंत बीज सुभाल । मन वांछित फल लागती, फिल ही भव भव कालरे ॥२६।। पत्र १६३ से १८१ तक पत्ती मे काट कर ले जाये गये है।
SR No.090396
Book TitleRajasthan ke Jain Shastra Bhandaronki Granth Soochi Part 5
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKasturchand Kasliwal, Anupchand
PublisherPrabandh Karini Committee Jaipur
Publication Year
Total Pages1446
LanguageHindi
ClassificationCatalogue, Literature, Biography, & Catalogue
File Size30 MB
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