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________________ 7 — - wwwww JLL मानभंग से उत्पन्न हुए दुःख के अतिरिक्त अन्य कोई दुःख सुख की हानि करनेवाला नहीं है । मानशाली अपना पराभव सहन नहीं कर सकते । मानी ( स्वाभिमानी ) मान को ही प्राण समझते हैं । अहंकारी लोग सब कुछ करते हैं । मानी मनुष्य प्रणाम मात्र से ही प्रसन्न हो जाते हैं। मानी ( स्वाभिमानी ) का जीवन संसार में सुखी होता है । तिरस्कार से प्राणियों को परम दुःख होता है । अपमान से तथा तज्जन्य दुःख से तो मर जाना परम सुख है । संसार में वह मनुष्य पुण्यात्मा है जो माता के प्रति विनयी होता है । कुलीन मनुष्यों में विनय स्वभाव से ही होता है। जहां मनुष्य अपरिचित होता है वहां उसका प्रादर नहीं होता । बड़ों की चरणसेवा से बड़प्पन प्राप्त होता है। सरल परिणामी मनुष्य को ठगने में कोई चतुराई नहीं है । -दूसरों के प्रति सद्भाव दिखाना हो मनुष्य का उपकार है । शत्रुनों की परस्पर मित्रता महान भय का कारण होती है । तिर्यंच भी बन्धुजनों के साथ मंत्रोभाव का पालन करते हैं । एकचित्त हो जाना ही मित्रता है। ७६
SR No.090386
Book TitlePuran Sukti kosha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanchandra Khinduka, Pravinchandra Jain, Bhanvarlal Polyaka, Priti Jain
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year
Total Pages129
LanguagePrakrit, Sanskrit
ClassificationDictionary & Literature
File Size2 MB
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