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________________ Breathinatantan प्रवचनसार-सप्तदशाङ्गो टोका मयतदुपलब्धशुद्धात्मा सफलज्ञानी ध्यायतीत्युत्तरमासूत्रयति---- सव्वाबाधविजुत्तो समंतसमक्खसोक्खणाणड्ढो । भूदो अक्खातीदो झादि अणक्खो परं सोक्खं ॥१६८॥ सर्वबाधाविजित, समन्त सर्वाक्षजानसौख्यमयी । इन्द्रियातीत इन्द्रिय विगत परम सौख्यको पाते ॥१६॥ * सर्वाबावियुक्तः समन्तसक्षिसौख्यज्ञानाढयः । भूतोऽक्षातीतो ध्यायत्यनक्षः परं सोत्यम् ॥ १५८ !! अयमात्मा दैद सहजसोख्यज्ञान बाधायतनानामसार्वदिक्कासकलपुरुषसोख्यमानायत. नान चाक्षाणामभावात्स्वयमनक्षत्वेन वर्तते तदेव परेषामक्षातीतो भवन निराबाधसहजसोख्य मानत्वात् सर्वाचाववियुक्तः, सार्वदिक्कसकलापुरुषसोख्यज्ञान पूर्णत्वात्समन्तसक्षिसौख्य ज्ञानाच्या नामसंज्ञ---सन्याबावजुत्त समंतसव्वाखसोक्दणाणड्ढ भूद अक्खातीद अपाक्ख पर मौस्य । पातुसंत्र--मा ध्याने । प्रातिपदिक----सर्वाबाधवियुक्त समन्त सर्वाक्षसौख्यज्ञानादय भूत अक्षातीत अनक्ष पर लोख्य । मूलधातु-ध्य चिन्तायां । उभयपदविवरण-सुशिवियुक्तः समन्तसर्वाक्षसोस्यज्ञानाढयः भूतः अहातीत: अनक्ष: सम्वादाविजुत्तोसमंतसव्वक्खसोखणड्ढो भूदो अक्खातीदो अगवखो-प्रथमा एक वचन । परं सोवन सोस्य-द्वितीया एकवचन । मादि ध्यायलिन्दर्तमान अन्य पुरुष एकवचन क्रिया। । सिद्धत्वकी सिद्धि हो है । प्रसंगविवरण ---- अनन्तरपूर्व माथा में ग्रादेषरूप अथवा अन्तःस्वरूप जानने के लिये प्रश्न पासूनित किया गया था कि उपलब्ध शुद्धात्मा सर्वज्ञ भगवान क्या ध्यान करते हैं। अब इस गोयामें उसी प्रश्नका उत्तर प्रासूत्रित किया गया है कि सर्वज्ञ भगवान अपनेको अनन्तानन्दमय अनुभवते हैं। है तथ्यप्रकाश--(१) जब तक सहज ज्ञानानन्दकी बाधिकायें इन्द्रियां हैं तब तक यह मात्मा सर्ववाघावोंसे बाधित है । (२) याप ये इन्द्रियां कुछ कल्पित सुख ब जानके बाह्य साधन हैं तथापि वह होनता व भ्रान्ति के कारण क्षोभ व मलिनतासे प्राकुल स्थिति है । (२) जब इन्द्रियरहित प्रतिकार सहज चित्प्रकाश मात्र अन्तस्तत्त्वकी अभेद पाराघनासे प्रात्मा प्रतीन्द्रिय हो जाता है तब ही त्वरित निर्वाध सहज परिपूर्ण ज्ञान व प्रानन्दरूप परिणत होता मा सर्ववाघावोंसे रहित हो जाता है । (४) जो प्रात्मा निविकार निर्वाध व परिपूर्णसहजा. जन्तानन्दमय हो गया है उसके अभिलाषाका होना संभव है । (५) जो प्रात्मा सर्वतः परिपूर्ण सर्वजाता है, वीतराग है उसके जिज्ञासा व संदेह होना असम्भव है । (६) जहां रंच भी प्रभिलाषा, जिज्ञासा व सन्देह त्रिकाल कभी हो ही नहीं सकता वह वीतराम सर्वज्ञ परमात्मा कर AN
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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