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________________ ......... . .::. .: :: .:.: PRAKASHMA :::::: ... ....... રજ सहजानन्दशास्त्रमालाया पर्यायात्पृथिवीस्कन्धाच्च सकलस्यापि पुद्गलस्याविशेषण विशेष मुरत्वेन विद्यन्ते । ते च मूर्तस्वादेव शेषद्रव्यारणामसंभवन्तः पुद्गलमधिगमयन्ति । शब्दस्यापोन्द्रियग्राह्यत्माद्गुणत्वं न खल्वाशनीय, तस्य वैचित्र्यप्रपञ्चित बैशवरूपस्याध्यनेकद्रव्यात्मकपुद्गलपर्यायत्त्वेनाभ्युपगम्यमानत्वात् । गुगत्ये वा न तावदमूर्तद्रव्यगणः शब्दः गुणगुणिनोरविभक्तप्रदेशस्वेनं कवे दनवेद्यत्वादमूर्तद्रव्यस्थापि श्रवणेन्द्रियविषयत्वापत्तेः । पर्यायलक्षणेनोत्खातगुणलक्षणत्वान्मूर्तद्रव्यगुणोऽपि न भवति । पर्यायलक्षणं हि कादाचिकत्वं गणलक्षणं तु नित्यत्वम् । ततः कादाचित्कत्वोत्खा सनित्यत्वस्य न शब्दस्यास्ति गुरगत्वम् । यत्तु तत्र नित्यत्वं तत्तदारम्भकपद्गलानां तद्गुणानां च स्पर्शादीनामेव न शब्दपर्यायस्येति दृढतरं नाह्यम् । न च पुद्गलपर्यायत्वे शब्दस्य पृथिवीस्कन्धस्येव स्पर्शनादीन्द्रियविषयत्वम् । अपो प्रारणेन्द्रियाविषयत्वात, ज्योतिषो घ्राणरमनेन्द्रियाविषयत्वात्, मझलो प्राणरमनचक्षुरिन्द्रियाविषयत्वाच्च । न चागन्धागन्धरसागन्धरसबर्गाः, एवमपज्योतिरुितः, सर्वपुद्गलानां स्पर्शादिचतुष्कोपेतत्वाभ्युपगमात् । व्यक्तस्पादिचतुपकानां च चन्द्रकान्तारणियवानामारम्भकैरेव पुद्गलैरन्यक्तगन्धान्यक्तगन्धरसाव्यक्तगन्धरसवर्णाविद्यन्ते-वर्तमान अन्य पुरुष बहुवचन किया । युगलस्स पुद्गलस्य-षष्ठी एकवचन । सुहमादो सुश्मात्पंचमी एक० । पुदवीपरियंतरस पृथ्वीयर्यन्तस्य-षष्ठी एक । सदो शब्दः सो सः पोग्गलो पागल: चित्तों चित्र:-प्रथमा एकवदन । निरुक्ति--- वर्ण्यते वर्णनं वा वर्ग:, रस्यते रसनं बा रस:, गन्ध्यते गन्धन वा नेन्द्रियका विषय नहीं है और वायु, घ्राण, रसना तथा चक्षइन्द्रिय का विषय नहीं है। और ऐसा भी नहीं है कि-पानी गंधरहित है अग्नि मंध तथा रस रहित है और वायु गंध, रस तथा वर्ण रहित है, क्योंकि सभी पुद्गल स्पर्शादिचतुष्कयुक्त स्वीकार किये गये हैं। क्योंकि जिनके स्पर्शादिचतुष्क व्यक्त हैं ऐसे चन्द्रकान्तमणि, अररिण और जनाके प्रारंभक पुद्गलोंके द्वारा जिसकी गंध अव्यक्त है ऐसे पानीकी, जिसको गंध तथा रस अव्यक्त है ऐसी अग्निकी, और जिसकी गंध, रस तथा वर्ण अव्यक्त है ऐसी उदरवायुको उत्पत्ति होती देखी जाती है। और कहीं किसी गुणका कादाचित्क परिणामकी विचित्रताके कारण होने वाला व्यक्सपना या अव्यक्तपना नित्यद्रव्यस्वभावका प्रतिघात नहीं करता । इस कारण शब्द पुद्गलपर्याय ही है । प्रसंगविवरण---...अनन्तरपूर्व माथामें मूर्त व अमूर्त गुणोंका लक्षण व सम्बन्ध बताया गया था। अब इस गाथामें मूतं पुद्गलद्रव्यके गुणोंको बताया गया है । तथ्यप्रकाश--१- इन्द्रियोंके विषयभूत होनेसे स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण इन्द्रियग्राह्य कहलाते हैं । २-स्पर्श रस गंध वर्ण ये गुण पुद्गलोंके होते हैं । ३-किन्हीं पुद्गलोंके स्पादि गुणोंमें इन्द्रियग्राह्यत्वकी व्यक्ति भी हो गई है अतः वे गृह्यमाण है ! ४-- किन्हीं पुग़लोंके स्पर्शादि गुणोंमें इन्द्रियग्राह्यत्वको शक्ति मात्र है, अतः वे अगृह्यमाणा हैं । ५- स्पर्शादिक गुण ............. . ... h.lation.mmieritamwaalinima... ma... --mang- DoramaRTA HalogenBHAIRMIRROTATOMAChummaNYANESHAYARYANAPAYARI mm.....-------- MainamainamAHAR
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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