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________________ AMANISHTRARASHREE" MRENDRANI प्रवचनसार-सप्तदशाङ्गी टीका अथ जीवस्य द्रव्यत्वेनावस्थितत्वेऽपि पर्यावरनस्थितत्वं द्योतयति --- जायदि ग्रेव ण णास्मदि खणभंगसमुभवे जगा कोई । जो हि भवो सो दिलश्रो संभवविलय तिते पाणा ॥११६।। उपजे नहीं न चिनशे, तथापि क्षरण हि क्षरण सर्ग लब होते। जो भव वह लय श्यया संभव लय अन्य अन्य हुए ॥११॥ जायते नंदन नश्यति क्षणभङ्गसमुनवे जो कश्चित् । यो हि भवः स विलयः संभवविक्षयाविति तो नाना ।। इह तावन्न कश्चिज्जायते न भ्रियते च । अथ च मनुष्यदेवतिर्यनारकात्मको जोय. लोकः प्रतिक्षणपरिणामित्वादुत्संगितक्षगभगोत्लादः न च विप्रतिचिद्धमेतत्, संभवधिलयमारक स्वनानात्वाभ्याम् । यदा खलु भङ्गोमादयोरे कत्वं तदा पूर्वपक्षः, यदा तु नानात्वं तदोत्तरः । A नामसं-- एव क्षणभंगरामुभव जण कोई ज हि भव त विलय संभवविलय त्ति त पाणा । बासुसज---जा प्रादुर्भावे, नस्स नाशे । प्रातिपदिक ---न एव क्षणभङ्गसमृद्भव जन कश्चित् यत् हि अब त EMAINE प्रयोग--स्वभावधातसे बचने के लिये स्वभाव विभादका भेदविज्ञान कर स्वभावका दर्शक होने का अन्तः पौरुष होने देना ॥ ११८ ॥ FORIES अब जीवकी द्रव्यरूपसे स्थिरता होनेपर भी पर्यायोंसे अस्थिरताको प्रकाशते हैं---- क्षम असमुद्धवे जने] प्रतिक्षण विनाश और उत्पाद वाले जोवलोकमें [कश्चित् ] कोई [न ख नायते न तो उत्पन्न होता, और [न नश्पति] न नष्ट होता है; [हि] क्योंकि य: भवः सः विलयः] जो जीव उत्पादरूप है वही विनाशरूप है: [संमविलयौ इति तो नाना फिर भी उत्पाद उत्पाद है, विनाश विनाश ही है। इस प्रकार में उत्पाद और व्यय नाना है प्रर्धात भिन्न-भिन्न हैं। E तात्पर्य-द्रव्यदृष्टिसे जीव वही एक अवस्थित है, पर्यायष्टिसे अनवस्थित है । टीकार्य--वास्तवमें यहाँ न कोई जन्म लेता है और न मरता है, और ऐसा अब स्थित होने पर भी मनुष्य-देव-तिर्यंच-नारकात्मक जीवलोक प्रतिक्षण परिणामी हानेसे क्षण-क्षण में होने वाले विनाश और उत्पादके साथ जुड़ा हुआ है । और यह विरोबको प्राप्त नहीं होता; क्योकि उत्पाद और विलयका एकत्व और अनेकत्व है जब उतसाद और विलयका एमाम है तब पूर्वपक्ष है, और जब अनेकदव हैं तब उत्तरपक्ष है । इसीका स्पष्टीकरण- जैसे:पड़ा है वहीं कुण्ड है' ऐसा कहा जानेपर, घड़े और कुण्डके स्वरूपका एकत्व असम्भव होनेस उन दोनोको माधारभूत मिट्टी प्रगट होती है, उसी प्रकार 'जो उत्पाद है वही विनाश है' ऐसा FARहा जानेपर उत्पाद और विनाशके स्वरूपका एकत्व असम्भव होनेसे उन दोनोंका आधारभूत B800VOI थ OM10/5AREL - N hi Music mmm BarwwwwORE MAKER
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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