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________________ १७२ सहजानन्दशास्त्रमालायां अथ द्रव्यलक्षणमुपलक्षयति अपरिचत्तसहावेणुप्पादव्वयधुवत्तसंबद्ध । गुगणवं च सपज्जायं जं तं दव्वं ति वुच्चंति ॥१५॥ न स्वभाव छुटनेसे, स्थिति व्यय उत्पाद धर्मसे तन्मय । जो गुणवंत सपर्यय, उसको प्रभु द्रव्य कहते हैं ।।६।। अपरित्यक्तस्वभावनोत्पादध्ययध्रुवत्वसंबद्धम् । गुपावच्च सपर्यायं यत्तद्र्ध्यमिति दुवन्ति ॥ १५११ ___ इह खलु यदनारब्धस्वभावभेदमुत्पादव्ययध्रौव्यत्रयेण गुणपर्यायद्वयेन च यल्लक्ष्यते तद्द्रव्यम् । तत्र हि द्रव्यस्य स्वभावोऽस्तित्वसामान्यान्वयः, अस्तित्वं हि वक्ष्यति द्विविध, स्वरूपास्तित्वं सादृश्यास्तित्वं चेलि ! सत्रोत्पादः प्रादुर्भावः, व्ययः प्रच्चननं, ध्रौव्यमवस्थितिः । गुणा विस्तारविशेषाः, ते द्विविधाः सामान्य विशेषात्मकत्वात् । तत्रास्तित्वं नास्तित्वमेकत्वमन्यत्वं द्रव्यत्वं पर्यायत्वं सर्वगतत्वमसर्वगतत्वं सप्रदेशत्वमप्रदेशत्वं मूर्तत्वममूर्तत्वं सक्रियत्वमक्रियत्वं चेतनत्वमचेतनत्वं कर्तृत्वभकर्तुत्वं भोक्तृत्वमभोवतृत्वमगुरुलधुत्वं चेत्यादय: सामान्यगणाः । अवगाहहेतुत्वं गतिनिमित्तता स्थितिकारणत्वं वर्तनायतनत्वं रूपादिमत्ता चेतनत्यमित्यादयो विशेषगुणाः । पर्याया अायतविशेषाः, ते पूर्वमेवोक्ताश्चतुविधाः । न च तैरुत्पादादिभिर्गुणपर्या नामसंज--अपरिचत्तसहाव उप्पादव्ययधवत्तसंबद्ध गणवच सपज्जाय ज त दश्व लि । धातसंज. बु व्यक्तायां वाचि । प्रातिपदिक-अपरित्यक्तस्वभाव उत्पादव्यय ध्रुवत्वरांबद्ध गुणवत् सपर्याय यत् तत् पदार्थके यथार्थस्वरूपको अनेकान्तदृष्टि से वे ही पुरुष निरखते हैं जो पर्यायविषयक प्रासक्तिको छोड़कर आत्माके स्वभावमें ही लीन होनेका पौरुष करते हैं। (१७) पर्यायासक्ति छोड़कर आत्मस्वभावमें वे ही पुरुष लीन हो सकते हैं जो प्रात्मस्वभावका आदर करने में समर्थ हैं । (१८) आत्मस्वभावका वे ही पादर कर पाते जो समस्त विद्याके एक मूल भगवान प्रात्मस्वभावकी उपासनामें रहते हैं। (१६) स्वसमय हो आत्माका तत्त्व है। सिद्धान्त-(१) स्वसमय अवस्थाकी प्राप्तिका साधन एक अखण्ड चैतन्यस्वभावमात्र अात्माका परिचय है। दृष्टि-१- अखण्ड परमशुद्ध निश्चयनय (४४) । प्रयोग-पर्यायसे उपेक्षा करके आत्मस्वभावमें लीन होनेका पौरुष करना ॥१४॥ अब द्रव्यका लक्षण उपलक्षित करते हैं- [अपरित्यक्तस्वभावेन] नहीं छोड़ा है स्वभाव जिसने ऐसा [यत्] जो [उत्पादव्ययध्र वत्वसंबद्धम्] उत्पादव्ययध्रौव्यसंयुक्त है [च] तथा [गुरगवत् सपर्यायं] गुणयुक्त और पर्याय सहित है, [तत्] वह [द्रव्यम इति] 'द्रव्य' है
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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