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________________ १०४ अर्थतदेव प्रत्यक्षं पारमार्थिक सौख्यत्वेनोपक्षिपति- सहजानन्दशास्त्रमालायां जादं सयं समंतं खाणमतत्थवित्थडं विमलं । रहियं तु प्रोग्गहादिहिं सुहं ति एगंतियं भणियं ॥५६॥ जात स्वयं व समतज, निर्मल विस्तृत अनन्त प्रथमं । श्रवग्रहादिसे रहित ज्ञान हि को सुख कहा वास्तव ॥५६॥ ज्ञातं स्वयं समतं ज्ञानमनन्तार्थविस्तृतं विमलम हुने लवग्रहादिभिः सुखमिति ऐकान्तिक भणितम् ॥५६॥ स्वयं जातत्वात् समन्तत्वात् अनन्तार्थविस्तृतत्वात् विमलत्वात् प्रवग्रहादिरहितत्वा * प्रत्यक्षं ज्ञानं सुखमैकान्तिकमिति निश्चीयते श्रनाकुलस्यैकलक्षणत्वात्सौख्यस्य । यतो हि परत जायमानं पराधीनतया श्रसमंतमितद्वारावरणेन कतिपयार्थ प्रवृत्तमितरार्थत्या नामसंज्ञ--जाद सयं समंत गाण अर्थात् विमन रहिय तु ओग्गहादि सुनिएन भणिय । धातुसंज्ञ भण कथने । प्रातिपदिक-जात स्वयं समन्त ज्ञान अनन्तार्थविस्तृत विमन रहित अवग्रहादि सुख इति ऐकान्तिक भणित । मूलधातु भग शब्दार्थः । उभयपदविवरण - जा जान समं गाणं ज्ञानं व प्रकाशादिक से होने वाला स्वविषयभूत पदार्थका ज्ञान परके द्वारा प्रगट होता हुआ परोक्ष है ऐसा जाना जाता है, और जो अंतःकरण, इन्द्रिय, परोपदेश, उपलब्धि संस्कार या प्रकाशादिक व परद्रव्यकी अपेक्षा न करके एक मात्र ग्रात्मस्वभावको ही कारण ग्रहण करके सर्व द्रव्य पर्यायोंके समूहको एक समय में ही व्यापकर प्रवर्तमान ज्ञान है वह केवल आत्मासे ही उत्पन्न होनेसे प्रत्यक्ष है ऐसा जाना जाता है | यहाँ सहन सुखका सावनभूत यही महा प्रत्यक्ष ज्ञान इष्ट माना गया है । प्रसंगविवरण -- ग्रनन्तरपूर्व गाथा में इन्द्रियज्ञानके प्रत्यक्षार्हत्वका निषेध किया था । अब उसीके स्पष्टीकरण के लिये इस गाथा में परोक्ष व प्रत्यक्षका लक्षण कहा गया हैं । तथ्यप्रकाश - - ( १ ) परद्रव्य निमित्तके योग में पदार्थका ज्ञान करने वाला ज्ञान परीक्ष कहलाता हैं । (२) परोक्षज्ञानके होने में उपादान कारण पदार्थोपलब्धिके संस्कारसे युक्त वह आत्मा है । (३) परोक्ष ज्ञान होनेमें निमित्त कारण तत्तद्विषयकज्ञानावरका क्षयोपशम आदि है । ( ४ ) परोक्षज्ञान होनेपर संबद्ध निमित्तकारण है मन व इन्द्रियाँ | ( ५ ) परोक्ष ज्ञान होने में बाहरी निमित्त कारण है परोपदेश, प्रकाश आदि । ( ६ ) मन इन्द्रिय उपदेश संस्कार प्रकाश आदि कारणको अपेक्षा किये बिना मात्र ग्रात्मस्वभावको कारणरूप से उपादान करके जानने वाला ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाता है । ( ७ ) प्रत्यक्ष ज्ञान सहज श्रानंदका परम साधनीभूत है | ( ) जो सहज श्रानन्दका परमसाधनीभूत ज्ञान है वह महा प्रत्यक्ष ज्ञान है ।
SR No.090384
Book TitlePravachansara Saptadashangi Tika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Sermon
File Size22 MB
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