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________________ प्रदर्शित को । अन्त में अति उत्साह भरे "हमें भी मुक्ति लाभ हो" इस . भावना से अपने-अपने स्थान में चले गये । विशेष..... इनके काल में ही धर्म और स्वयंभू नाम के बलभद्र एवं नारायण हए । स्वयंभू नारायण ने द्वारावती के राजा रुद्र का पुत्र मधु (प्रतिनारायण) को उसी के चक्र द्वारा मारकर तीन खण्ड का राज्य प्राप्त किया। मधु मरकर नरक में गया । क्या ही पुण्य-पाप का खेल है। पुण्यपाप रूपी अग्नि में स्वयं ही यह जीव मुलसता है, मरता है और ८४ लाख योनियों में दुःख भोगता है । स्वयम्भू नारायण ने यद्यपि ३ खण्ड का राज्य पाया किन्तु भोगासक्त होने से नरकासू बंध कर उसी सातवें नरक में गया । अतः प्रेम या द्वेष की वासना कभी नहीं रखना चाहिए । धर्म बलदेव इस कृत्य से भयभीत हए । संसार, शरीर भोगों का परित्याग कर दीक्षित हो कठोर तपः साधना से कर्म काण्ड भस्म कर शुद्ध हो मोक्ष स्थान पर जा विराजे । ७%3- 3000m A MOMALoc त्रिह शुकर ..A AII -- प्रश्नावली-- १. विमलनाथ भगवान के जीवन की क्या विशेषता है ? २. समुद्रात किसे कहते हैं ? ३. केवली भगवान आयु के बराबर अन्य कर्मों की स्थिति को किस प्रकार करते हैं ? ४. नारायण कितने स्वण्ड़ों का राजा होता है ? ५. इनकी जन्म नगरी का नाम बतानो ? माता-पिता का क्या नाम है ? ६. इनका मोक्ष स्थान कहाँ है ? उसके दर्शन का क्या फल है ? ७, इनके समवशरण में कितने मुनि, श्रावक और श्राविका थीं ? १७२ ]
SR No.090380
Book TitlePrathamanuyoga Dipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijayamati Mata, Mahendrakumar Shastri
PublisherDigambar Jain Vijaya Granth Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages271
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Story, Literature, H000, & H005
File Size5 MB
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