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________________ प्रमाणमीमांसा ६७ क्रमाभ्यां व्याप्ता द्रव्यपर्यायैकान्तवदुभयात्मकादपि व्यावर्तताम् । शक्यं हि वक्तुमुभयात्मा भावो न क्रमेणार्थक्रियां कर्तुं समर्थः, समर्थस्य क्षेपायोगात् । न च सहकापेक्षा युक्ता, द्रव्यस्याविकार्यत्वेन सहकारिकृतोपकारनिरपेक्षत्वात् । पर्यायाणां च क्षणिकत्वेन पूर्वापरकार्यकालाप्रतीक्षणात् । नाप्यक्रमेण युगपद्धि सर्वकार्याणि कृत्वा पुनरकुर्वतोऽनर्थं क्रियाकारित्वादसत्त्वम् कुर्वतः क्रमपक्षभावी दोषः । द्रव्यपर्यायवादयोश्च यो दोषः स उभयवादेऽपि समानः “प्रत्येकं यो भवेद्दोषो द्वयोर्भावे कथं न सः ?" इति वचनादित्याह - पूर्वोत्तराकारपरिहार स्वीकारस्थितिलक्षणपरिणामेनास्यार्थक्रियोपपत्तिः ॥३३॥ १३२ - ' पूर्वोत्तरयोः ' ' आकारयोः' विवर्तयोर्यथासङ्ख्येन यौ 'परिहारस्वीकारौ' ताभ्यां स्थितिः सैव 'लक्षणम्' यस्य स चासौ परिणामश्च तेन 'अस्य' द्रव्यपर्यायात्मकस्यार्थक्रियोपपद्यते । क्रिया क्रम और अक्रम ( यौगपद्य) के साथ व्याप्त है । वह जैसे एकान्त द्रव्यात्मक और एकान्त पर्यायात्मक पदार्थ घटित नहीं होती, उसी प्रकार द्रव्यपर्यायात्मक पदार्थ में भी नहीं घटित होना चाहिए। कहा जा सकता है कि उभयात्मक पदार्थ क्रम से अर्थक्रिया नहीं कर सकता, क्योंकि क्रम से करने में कालक्षेप होता है और समर्थ जो होता है, वह कालक्षेप नहीं करता । अगर सहकारी कारणों की अपेक्षा रखने के कारण क्रम कार्य करता हो तो भी ठीक नहीं, क्योंकि द्रव्य में किसी प्रकार का विकार नहीं हो सकता, अतएव उसे सहायक कारणों द्वारा होने वाले उपकार की अपेक्षा नहीं होती और पर्याय क्षणिक होते हैं, अतएव वे भी आगे-पीछे के कार्यकालकी प्रतीक्षा नहीं कर सकते । द्रव्य-पर्यायात्मक पदार्थ अक्रम से ( एक साथ) भी अर्थक्रिया नहीं कर सकता, क्योंकि एक साथ सब क्रियाएँ कर लेगा तो दूसरे आदि समयों में कुछ नहीं करेगा और ऐसी स्थिति में. अर्थक्रियाकारी न होने से असत् हो जाएगा। फिर भी क्रिया करेगा तो पक्ष के दोषों का प्रसंग होगा । एकान्त द्रव्यपक्ष ( नित्यवाद) में और एकान्त पर्यायपक्ष (अनित्यवाद - क्षणिकपक्ष ) में जो जो दोष आते हैं, वे उभयवाद में समान हैं। क्योंकि एक-एक पक्ष में आने वाले दोष उभयपक्ष में कैसे नहीं होंगे ?' अवश्य होंगे। इस शंका का समाधान करते हैं अर्थ - पूर्व पर्याय का परित्याग, उत्तर पर्याय का उत्पाद और स्थिति अर्थात् ध्रौव्यस्वरूप परिनाम से द्रव्य-पर्यायात्मक पदार्थ में अर्थक्रिया संगत होती है ॥ ३३ ॥ १३२ - द्रव्य - पर्यायात्मक पदार्थ अपने पूर्व-पूर्व के पर्याय को त्यागता रहता है और नवीन नवीन पर्याय को धारण करता रहता है और द्रव्य रूप से वह ध्रुव भी रहता है । यह उत्पाद व्यय और ध्रौव्य ही उसका परिणाम कहलाता है । इस परिणाम के कारण पदार्थ अर्थक्रिया करता है ।
SR No.090371
Book TitlePraman Mimansa
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorShobhachad Bharilla
PublisherTilokratna Sthanakvasi Jain Dharmik Pariksha Board
Publication Year1970
Total Pages180
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size18 MB
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