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________________ २५ ४७-- अथ मुख्यसांव्यवहारिकभेदेन द्वैविध्यं प्रत्यक्षस्य हृदि निधाय मुख्यस्य लक्षणमाह-" तत् सर्वथावरणविलये चेतनस्य स्वरूपाविर्भावो मुख्यं केवलम् ||१५|| ४८- 'तत्' इति प्रत्यक्षपरामर्शार्थम्, अन्यथानन्तरमेव वैशद्यमभिसम्बध्येत । -दीर्घकालनिरन्तरसत्कारासेवितरत्नत्रयप्रकर्षपर्यन्ते एकत्ववितर्काविचारध्यानबलेन निःशेषतया ज्ञानावरणादीनां घातिकर्मणां प्रक्षये सति चेतनास्वभावस्यात्मनः प्रकाशस्वभावस्येति यावत्, स्वरूपस्य प्रकाशस्वभावस्य सत एवावरणापगमेन 'आविर्भाव: ' आविर्भूतं स्वरूपं मुखमिव शरीरस्य सर्वज्ञानानां प्रधानं 'मुख्यम् ' प्रत्यक्षम् । तच्चेन्द्रियादिसाहायकविरहात् सकलविषयत्वादसाधारणत्वाच्च 'केवलम्' इत्यागमे प्रसिद्धम् । प्रमाणमीमांसा ४९-प्रकाशस्वभावता कथमात्मनः सिद्धेति चेत्; एते ब्रूमः - आत्मा प्रकाशस्वभाव:, असन्दिग्धस्वभावत्वात्, यः प्रकाशस्वभावो न भवति नासावसन्दिग्धस्वभावो यथा घटः, न च तथात्मा, न खलु कश्चिदहमस्मि न वेति सन्दिग्धे इति नासिद्धो हेतुः । तथा, आत्मा प्रकाशस्वभावः, बोद्धत्वात्, यः प्रकाशस्वभावो न भवति नासौ ४७- प्रत्यक्ष प्रमाण दो प्रकार का है-मुख्य और सांव्यवहारिक, इसे ध्यान में रखकर मुख्य प्रत्यक्ष का लक्षण कहते हैं अर्थ- आवरणों का सर्वथा क्षय हो जाने पर चेतन आत्मा का स्वरूप प्रकट हो जाना मुख्य प्रत्यक्ष है ॥ १५ ॥ ४८--सूत्र में 'तत्' शब्द का ग्रहण न किया होता तो इससे पहले कहे हुए वैशद्य' का ग्रहण हो जाता । दीर्घकालपर्यन्त बहुमान पूर्वक भली माँति सेवन किये हुए रत्नत्रय के प्रकर्ष के 'अन्त एकत्व वितर्क-विचारनामक शुक्ल ध्यान के बल से, पूर्ण रूप से ज्ञानावरण आदि घातिक कर्मों का क्षय हो जाने पर, चेतनाप्रकाश-स्वभाव वाले आत्मा का प्रकाश स्वरूप प्रकट हो जाना मुख्य प्रत्यक्ष कहलाता है । जैसे सम्पूर्ण शरीर में मुख प्रधान होता है, उसी प्रकार सर्व ज्ञानों में प्रधान होने से वह मुख्य प्रत्यक्ष कहलाता है । आगम में यह केवलज्ञान के नाम से प्रसिद्ध है, क्योंकि यह इन्द्रिय आदि सहायकों के विना ही होता है, विश्व के समस्त पदार्थों को जानता है, और असाधारण है । ४९ - शंका - आत्मा प्रकाशस्वभाव है, यह कैसे सिद्ध होता है ? समाधान- आत्मा प्रकाशस्वभाव है, क्योंकि वह असंदिग्ध स्वभाव वाला है, जो प्रकाशस्वभाव नहीं होता वह असंदिग्ध स्वभाव वाला नहीं होता, जैसे घट | आत्मा असंदिग्ध स्वभाव वाला न हो, ऐसा नहीं है, क्योंकि मैं हूँ अथवा नहीं हूँ, ऐसा सन्देह किसी को नहीं होता । औरआत्मा प्रकाशस्वभाव है, क्योंकि वह बोद्धा अर्थात् ज्ञापक है, जो प्रकाशस्वभाव नहीं होता वह
SR No.090371
Book TitlePraman Mimansa
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorShobhachad Bharilla
PublisherTilokratna Sthanakvasi Jain Dharmik Pariksha Board
Publication Year1970
Total Pages180
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size18 MB
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