________________
प्रमाणमीमांसा
१५९
इत्यादि । ततः स्पष्टार्थवाचकैस्तैरेवान्यैर्वा शब्दः सभ्याः प्रतिपादनीयाः । तदप्रतिपा-' दशब्दानां तु सकृत् पुनः पुनर्वाभिधानं निरर्थकं न तु पुनरुक्तमिति । यदपि अर्थबापन्नस्य स्वशब्देन पुनर्वचनं पुनरुक्तमुक्तं यथा असत्सु मेघेषु वृष्टिर्न भवतीत्युक्ते अर्यादापद्यते सत्सु भवतीति तत् कण्ठेन कथ्यमानं पुनरुक्तं भवति, अर्थगत्यर्थे हि शब्द - प्रयोगे प्रतीतेऽर्थे किं तेनेति ? । एतदपि प्रतिपन्नार्थप्रतिपादकत्वेन वैयर्थ्यानिग्रहस्थानं नान्यथा । तथा चेदं निरर्यकान्न विशिष्येतेति १३ ।
९४ - पर्षदा विदितस्य वादिना त्रिरभिहितस्यापि यदप्रत्युच्चारणं तदननुभावणं नाम निग्रहस्थानं भवति, अप्रत्युच्चारयत् (न्) किमाश्रयं दूषणमभिदधतीति ( ० बधीतेति ) । अत्रापि कि सर्वस्य वादिनोक्तस्याननुभाषणम् उत यन्नान्तरीयिका साध्यसिद्धिस्तस्येति ? । तत्राद्यः पक्षोऽयुक्तः, परोक्तमशेषमप्रत्युच्चारयतोऽपि दूषणवचनाव्याघातात् । यथा सर्वमनित्यं सत्त्वादित्युक्ते सत्त्वादित्ययं हेतुविरुद्ध इति हेतुमेवोच्चार्य विरुद्धतोद्भाव्यते क्षणक्षयाद्येकान्ते सर्वथार्थ क्रियाविरोधात् सत्त्वानुपपत्तेरिति च सम
स्पष्ट अर्थ के बाचक उन्हीं शब्दोंद्वारा अथवा अन्य शब्दोंसे सभ्यों को अपना अभीष्ट समझा देना उचित है। हाँ, जो अर्थ के वाचक न हों ऐसे शब्दों का न तो एक बार प्रयोग करना चाहिए और न बार-बार प्रयोग करना चाहिए, परन्तु ऐसे शब्दों के प्रयोग से निरर्थक निग्रहस्थान होता है, पुनरुक्ति नहीं। जो बात अर्थ से जानी जाय उसे शब्दों द्वारा पुनः कहना पुनरुक्ति है, जैसे- 'मेघों के अभाव में वृष्टि नहीं होती, ऐसा कहने पर यह स्वयं विदित हो जाता है कि'मेघों के होने पर वृष्टि होती है । किन्तु इन शब्दों को कंठ से कहना पुनरुक्ति है, क्योंकि जब अर्थ समझ में आ जाय तो उसे शब्दों द्वारा कहने की क्या आवश्यकता है ? यह भी प्रतीत अर्थ का प्रतिपादक होने के कारण निग्रहस्थान है, अन्यथा नहीं। इस प्रकार यह पुनरुक्त निग्रहस्थान निरर्थक से भिन्न नहीं है ।
९४ - अननुभाषण- - सभ्य जिसे समझ लें और वादी तीन बार जिसका उच्चारण कर दे प्रतिवादी उसका प्रत्युच्चारण न करे तो अननुभाषण नामक निग्रहस्थान होता है। वादीके कथन का प्रत्युच्चारण ही न करेगा तो उसमें दूषण कैसे दे सकता ? इस संबंध में विचारणीय है कि - क्या वादी के समग्र कथन का उच्चारण न करना अननुभाषण निग्रहस्थान है या जिसका उच्चारण किये विना साध्य की सिद्धि न हो सकती हो, उसका उच्चारण न करना अननुभाषण है ? इनमें से पहला पक्ष स्वीकार करना अयुक्त है, क्योंकि वादी के समग्र कथन का प्रत्युच्चारण किये बिना भी दूषण का प्रयोग करने में कोई रुकावट नहीं हो सकती । यथा-वादी ने कहा 'सर्व पदार्थ अनित्य हैं, क्योंकि सत् हैं, यहाँ प्रतिवादी वादी के पूरे कथन को न दोहरा कर सिर्फ यही कहता है- 'क्योंकि सत् है' यह हेतु विद्ध है । इस प्रकार हेतु को ही दोहरा कर उसमें विरुद्ध दोष का उद्भावन करता है-क्षणक्षय आदि एकान्त में अर्थक्रिया का सर्वथा विरोध है, अतएव सत्त्व घटित नहीं हो सकता । ऐसा कह कर प्रतिवादी वादी के हेतु का निर