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________________ प्रमाणमीमांसा सति इत्यादिविशेषणमुपाददानो हेत्वन्तरेण निगृहीतो भवति । इदमप्यतिप्रसृतम्, यतोऽविशेषोक्ते दृष्टान्ते उपनये निगमने वा प्रतिषिद्ध विशेष मिच्छतो दृष्टान्ताद्यन्तरमपि निग्रहस्थानान्तरमनुषज्येत, तत्राप्याक्षेपसमाधानानां समानत्वादिति ५। ८५-प्रकृतादर्थान्तरं तदनौपयिकमभिदधतोऽर्थान्तरं नाम निग्रहस्थानं भवति । यथा अनित्यः शब्दः, कृतकत्वादिति हेतुः । हेतुरिति हिनोतेर्धातोस्तुप्रत्यये कृदन्तं पदम् । पदं च नामाख्यातनिपातोपसर्गा इति प्रस्तुत्य नामादीनि व्याचक्षाणोऽर्थान्तरेण निगृह्यते । एतदप्यर्थान्तरं निग्रहस्थानं समर्थे साधने 'दूषणे वा प्रोक्ते निग्रहाय कल्पेत, असमर्थे वा? । न तावत्समर्थे; स्वसाध्यं प्रसाध्य नृत्यतोऽपि दोषानावाल्लो. कवत् । असमर्थेऽपि प्रतिवादिनः पक्षसिद्धौ तत् निग्रहाय स्यादसिद्धौ वा? । प्रथमपक्षे तत्पक्षसिद्धेरेवास्य निग्रहो न त्वतो निग्रहस्थानात् । द्वितीयपक्षेऽप्यतो न निग्रहः, पक्षसिद्धरुभयोरप्यभावादिति ६ । करने पर जातिमत्त्वे १सति ऐसा विशेषण लगाने वाला वादी हेत्वन्तर निग्रहस्थान से पराजित होता है । किन्तु यह भी ठीक नहीं है । जैसे निविशेषण हेतु का प्रयोग करने पर बाद में विशेषण लगाना हेत्वन्तर है, उसीप्रकार निविशेषण दृष्टान्त, उपनय या निगमन का प्रयोग किया जाय और प्रतिवादी उसमें दोष प्रदर्शित करे तो दृष्टान्त आदि में विशेषण लगाना भी दृष्टान्तर,उपनयान्तर और निगमनान्तर नामक निग्रहस्थान मानना चाहिए। क्योंकि जो युक्ति हेत्वन्तर के लिए है वही दृष्टान्तर आदि के लिए भी होगी। ८५-अर्थान्तर-प्रकृत अर्थ से अर्थान्तर का कथन करना जिसका कि प्रकृत अर्थ की सिद्धि से कोई सम्बन्ध न हो अर्थान्तर निग्रहस्थान कहलाता है। यथा-शब्द अनित्य है, क्योंकि वह कृतक है । यहाँ कृतकत्व हेतु है । 'हिनोति, धातु से 'तु, प्रत्यय लगाने पर 'हेतु. ऐसा कृदन्तपद निष्पन्न होता है । पद कई प्रकार के होते हैं-नामपद, आख्यातपद, निपातपद और उपसर्गपद इस प्रकार कह कर फिर नाम आदि की व्याख्या करने वाला अर्थान्तर निग्रहस्थान से निगृहीत होता है। किन्त यह अर्थान्तरनामक निग्रहस्थान साध्य को सिद्ध करने में समर्थ साधन या समर्थ दूषण का प्रयोग करने पर निग्रह का कारण होता है या असमर्थ साधन या दूषण का प्रयोग करने पर? यदि समर्थ साधन या दूषण के पश्चात् वादी अर्थान्तर-कथन करता है तो वह निग्रह का कारण नहीं होना चाहिए, क्योंकि अपने साध्य को सिद्ध कर चुकने के पश्चात् अगर वह नाचने भी लगे तो भी कोई दोष की बात नहीं हैं । लोक में भी ऐसा देखा जाता है। अगर वादी ने असमर्थ साधन अथवा दूषण का प्रयोग किया है तो प्रतिवादी के पक्ष की सिद्धि होने पर वादी निगृहीत होगा अथवा सिद्धि न होने पर भी निगृहीत हो जाएगा? अगर प्रतिवादी के पक्ष की सिद्धि होने १-इन्द्रिय का विषय होने से, इतना मात्र हेतु सामान्य में पाया जाता है अतः व्यभिचारी है किन्तु जातिमत्वे सति विशेषण लगाने से व्यभिचार नहीं होता. क्योंकि सामान्य जातिमान नहीं अर्थात सामान्य में सामान्य नहीं पाया जाता।
SR No.090371
Book TitlePraman Mimansa
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorShobhachad Bharilla
PublisherTilokratna Sthanakvasi Jain Dharmik Pariksha Board
Publication Year1970
Total Pages180
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size18 MB
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