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________________ १२६ प्रमाणमीमांसा भवन्ति । यदोभयवाद्यसिद्धत्वेन विवक्ष्यन्ते तदोभयासिद्धा भवन्ति ॥१९॥ ४४-विरुद्धस्य लक्षणमाह विपरीतनियमोऽन्यथैवोपपद्यमानो विरुद्धः २०॥ ४५-'विपरीतः' यथोक्ताद्विपर्यस्तो 'नियमः' अविनाभावो यस्य स तथा, तस्यवोपदर्शनम् 'अन्यथैवोपपद्यमानः' इति । यथा नित्यः शब्दः कार्यत्वात्, परार्थाश्चक्षुरादयः संघातत्वाच्छयनाशनाद्यङ्गवदित्यत्रासंहतपारायें साध्ये चक्षुरादीनां संहतत्वं विरुद्धम् । बुद्धिमत्पूर्वकं क्षित्यादि कार्यत्वादित्यत्राशरीरसर्वज्ञकर्तृपूर्वकत्वे साध्ये कार्यत्वं विरुद्धसाधनाद्विरुद्धम् । ४६-अनेन येऽन्यैरन्ये विरुद्धा उदाहृतास्तेऽपि सङ्ग्रहीताः । यथा सति सपने चत्वारो भेदाः । पक्षविपक्षव्यापको यथा नित्यः शब्दः कार्यत्वात् । पक्षव्यापको विपक्षकदेशवृत्तिर्यथा निन्यः शब्दः सामान्यवत्त्वे सत्यस्मदादिबाह्येन्द्रियग्राह्यत्वात् । पक्षकवह अन्यतरासिद्ध में समाविष्ट हो जाता है और जब यह दोनों-वादी और प्रतिवादी को सिद्ध नहीं होते तो उभयासिद्ध हो जाते हैं । इस प्रकार इन सभी का पूर्वोक्त असिद्ध हेत्वाभासों में अन्तर्भाव हो जाता है ॥१९॥ ४४-विरुद्ध हेत्वाभास का लक्षण-सूत्रार्थ-जिसका अविनाभाव साध्य से विपरीत के साथ हो अतएव जो साध्य के विना ही होता हो वह विरुद्ध हेत्वाभास है ॥२०॥ .४५--पहले कहा जा चुका है कि साध्य के विना न होना हेतु का लक्षण है. किन्तु जो हेतु इससे विपरीत हो अर्थात् साध्य के विना ही होता हो वह विरुद्ध हेत्वाभास कहलाता है । जैसेशब्द नित्य है क्योंकि वह कार्य है ।(कार्य हेतु नित्यत्व साध्य से विपरीत अनित्यत्व के होने पर हो सकता है)। चक्षु आदि इन्द्रियाँ परार्थ (आत्मार्थ) हैं, क्योंकि संघातरूप हैं । जैसे शयन अशन आदि के अंग । यहाँ असंहतपरार्थता सिद्ध करने के लिए चक्षु आदि की संहतता विरुद्ध है। पृथ्वी आदि बुद्धिमत्कर्तृक हैं, क्योंकि कार्य हैं । यहाँ अशरीर सर्वज्ञकर्तृकता सिद्ध करने के लिए प्रयुक्त 'कार्य' हेतुविरुद्ध है । क्योंकि वह सशरीर और असर्वज्ञ कर्ता को सिद्ध करता है। ४६- अन्य लोगों ने विरुद्ध हेत्वाभास के जो अन्य उदाहरण दिए हैं, उन सब का संग्रह इसी लक्षण से हो जाता है । यथा-सपक्ष की विद्यमानता में चार भेद होते हैं। (१)पक्ष-विपक्षव्यापक-शब्द नित्य है, क्योंकि कार्य है । ( यहाँ कार्य हेतु पक्ष 'शब्द, में और विपक्ष 'घटादि, में व्याप्त है।) (२) पक्षव्यापक और विपक्षकदेशवृत्ति-शब्द नित्य है क्योंक वह सामान्यवान् होता हुआ हमारी बाह्य इन्द्रिय श्रोत्र द्वारा १ग्राह्य है। (यहाँ हेतु पक्ष में व्याप्त १-नैयायिक मत के अनुसार जो वस्तु जिस इन्द्रिय से ग्राह्य होती है , उसमें रहने वाली जाति (सामान्य) भी उसी इन्द्रिय द्वारा ग्राह्य होती है।
SR No.090371
Book TitlePraman Mimansa
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorShobhachad Bharilla
PublisherTilokratna Sthanakvasi Jain Dharmik Pariksha Board
Publication Year1970
Total Pages180
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size18 MB
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