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प्रमाणमीमांसा
तत्र नामधेयमात्रकीर्तनमुद्देशः, यथा इदमेव सूत्रम् । उद्दिष्टस्यासाधारणधर्मवचनं लक्षणम् । तद् द्वेधा,सामान्यलक्षणं विशेषलक्षणं च । सामान्यलक्षणमनन्तरमेव सूत्रम् । विशेषलक्षणम् "विशदः प्रत्यक्षम्" [१. १. १३] इति । विभागस्तु विशेषलक्षणस्यैवा
गमिति न पृथगुच्यते । लक्षितस्य 'इदमित्थं भवति नेत्थम्' इति न्यायतः परीक्षणं परीक्षा, यथा तृतीयं सूत्रम् ।
६ पूजितविचारवचनश्च मीमांसाशब्दः । तेन न प्रमाणमात्रस्यैव विचारोऽत्राधिकृतः, किन्तु तदेकदेशभूतानां दुर्नयनिराकरणद्वारेण परिशोधितमार्गाणां नयानाममपि "प्रमाणनयैरधिगमः" [ तत्त्वा० १. ६] इति हि वाचकमुख्यः, सकलपुरुषार्थेषु मूर्धाभिषिक्तस्य सोपायस्य सप्रतिपक्षस्य मोक्षस्य च । एवं हि पूजितो विचारो भवति । ___किसी वस्तु के सिर्फ नाम का उल्लेख करना उद्देश है, जैसे प्रकृत सूत्र-'अथ प्रमाण मीमांसा' । यहाँ प्रमाण के नाममात्र का ही उल्लेख है ।
जिसका उद्देश किया गया है, अर्थात् जिसके नाम का उल्लेखमात्र किया गया है, उसके असाधारण धर्म का-ऐसे विशिष्ट धर्म का कि जो उसके अतिरिक्त अन्यत्र न मिलसके-कथन करना लक्षण कहलाता है।
लक्षण दो प्रकार के हैं-सामान्य लक्षण और विशेष लक्षण । सामान्य लक्षण का उदा. हरण अगला-दूसरा सूत्र है, जिसमें सामान्य रूप से प्रमाण का स्वरूप बतलाया है। विशेष का उदाहरण-'विशदः प्रत्यक्षम्' अर्थात् विशद ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है । 'प्रत्यक्ष' विशेष प्रमाण है । और उसका इस सूत्र में लक्षण बतलाया गया है ।
विभाग अर्थात् भेद, विशेष लक्षण का ही अंग है। विशेष लक्षणों से ही भेद का पता चल जाता है । अतएव उसे अलग नहीं कहा है ।
लक्षण का कथन करने के पश्चात उस वस्तु का यवितपूर्वक परीक्षण किया जाता है। 'यह ऐसा है अथवा नहीं है' ऐसा विचार करना परीक्षा है। इस ग्रंथ का तीसरा सूत्र परीक्षा का उदाहरण है।
'मीमांसा का अर्थ है पूजित (प्रशस्त) विचार और पूजित वचन । मीमांसा शब्द का प्रयोग करके यह सूचित किया गया है कि इस ग्रन्थ में केवल प्रमाण का ही विचार प्रस्तुत नहीं है, किन्तु प्रमाण के एक अंशभूत तथा दुर्नय का निराकरण करके प्रमाण के मार्ग का परिशोधन करनेवाले नयों का भी विचार किया जाएगा। वाचक उमास्वाति ने कहा है-'प्रमाणनयरधिगमः' अर्थात् प्रमाणों और नयों से ही तत्त्वों का सम्यग्ज्ञान होता है।
प्रमाण एवं नय के अतिरिक्त यहाँ सब पुरुषार्थों में श्रेष्ठ मोक्ष का भी विचार किया जाएगा, मोक्ष के उपायों का अर्थात् संवर एवं निर्जरा तत्त्व का तथा उनके विरोधी-आस्रव तथा बन्ध आदि का भी विचार किया जाएगा। इन सब का विचार करना ही पूजित विचार है।