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________________ १६० ] * प्राकृत व्याकरण विभक्ति के एक वचन में पुल्लिंग में 'सि' प्रत्यय के स्थान पर 'ओ' की प्राप्ति होकर दरिओ रूप सिद्ध हो जाता है। इप्त - सिंहेन संस्कृत रूप है। इसका प्राकृत रूप दरिश्रमीण होता है। इनमें सूत्र संख्या १-१४४ से ॠ के स्थान पर 'रि' का आदेश; २०७७ से 'प' का लोपः १-१७७ सं' 'तू' का लोप; १६२ से स्व 'इ' की दीर्घ 'ई'; १-२६ स अनुस्वार का लोप ३-६ से तृतीया विभक्ति के एक वचन में पुल्लिंग में 'दा' प्रत्यय के स्थान पर 'ए' प्रत्यय की आदेश रूप से प्राप्ति; और ३-१४ से प्राप्त 'य' प्रत्यय के पूर्व में स्थित 'ह' के '' को 'ए' होकर 'दरिल सहज रूप सिद्ध हो जाता है | ॥ १४४ ॥ लुत इलिः क्लृप्त- क्लुन्ने ॥ १-१४५ ॥ अनपोत इलिरादेशो भवति ॥ किलित्त-कुभोवारेसु || धारा किलिम-वत्तं ॥ अर्थः- क्लृप्त और क्लून इन दोनों शब्दों में रही हुई 'लू' के स्थान पर 'इति' का आदेश होता । जैसे - तृप्त - कुसुमोपचारेषु किलित - कुसुमो क्यारे ॥ धारा-क्लृन्न पात्रम् = धारा- किलिन्न-वत्त ं ॥ = क्लप्त - कुसुमपचारेषु संस्कृत रूप है। इसका प्राकृत रूप किलितकुसुमोक्यारे होता है । इसमें सूत्र संख्या १-१४५ से 'लू' के स्थान पर 'इलि' का आदेश; २-७७ से 'पू' का लोप; २-५६ से 'त' का द्वित्व 'त'; १-२३१ से 'प' का 'व' १-१७७ से 'च' का लोप; १-१८० से शेष 'आ' का 'या'; १-२६० से 'घू' का 'स्' और ३०१५ से सप्तमी त्रिभक्ति के बहुवचन में प्राप्त 'सु' प्रत्यय के पूर्व में स्थित 'र' के 'अ' का 'ए' होकर किलित्त-कसमोषयारेसु रूप सिद्ध हो जाता है। धारा-क्लृन्नन्यात्रम् संस्कृत रूप है । इसका प्राकृत रूप धारा-किलिन्न-वत्त होता है। इसमें सूत्र संख्या १-१४५ से 'लू' के स्थान पर 'इलि' का आदेश १-२३१ से 'पू' का ''; १ ८४ से 'आ' का 'अ'; २७६ से 'र्' का लोप २-८६ से शेष 'स' का द्वित्व 'त' ३ २५ से प्रथमा विभक्ति के एक वचन में नपुंसक लिंग में 'सि' प्रत्यय के स्थान पर 'म्' प्रत्यय की प्राप्ति और १२३ से प्राप्त 'म्' प्रत्यय का अनुस्वार होकर धारा- किलिन रूप सिद्ध हो जाता है । । १४५ ।। एता वेदना पेटा देवर - सरे ॥ १-१४३ ॥ -1 वेदनादिषु एत इच्वं वा भवति ॥ विश्रणा वेणा । चविडा | विश्रडचवेडा विणोश्रा । I दिरो देवरो || मह महिम दसरा-किसरं । कैंसरं || महिला महेला इति तु महिला महेलाय शब्दाभ्यां सिद्धम् ॥ अर्थः-- वेदना, चपेटा, देवर, और केसर, इन शब्दों में रही हुई 'ए' की विकल्प से 'ह' होती है । जैसे- वेदना विवरणा और वेषणा || चपेटा चfear || विकट चपेटा-विनोदावयवेढा. = 김
SR No.090366
Book TitlePrakrit Vyakaranam Part 1
Original Sutra AuthorHemchandracharya
AuthorRatanlal Sanghvi
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages610
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari & Grammar
File Size17 MB
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