________________
८८]
* प्राकृत व्याकरण *
पदमम् संस्कृत शब्द है । इसके प्राकृत रूप पोम्म और पजमं होते हैं । इनमें सूत्र संख्या १-६१ से सादि 'अ' का 'ओ'; २-७७ से '' का लोप; २-८९ से 'म' का द्वित्व 'म'; ३.२५ से प्रथमा के एक वचन में नपुसक लिंग में 'सि' प्रत्यय के स्थान पर 'म' को प्राप्ति और १-२३ से प्राप्त 'म' का अनुस्वार होकर पोम्मं रूप सिद्ध हो जाता है । द्वितीय रूप में २-७७ से 'द' का लोय; २- १२ से 'द' के स्थान पर '' को प्राप्ति; ३-.५ से प्रथमा के एक वचन में नपुंसकलिंग में 'सि' प्रत्यय के स्थान पर 'म्' को प्राप्ति; और १-२३ से प्राप्त 'म्' का अनुस्वार होकर पउम रूप सिद्ध हो जाता है। 'छन्न' की सिद्धि आगे ३-११२ में की जायगी ।। ६१ ॥
नमस्कार-परस्परे द्वितीयस्य ।। १-६२ ।। अनयो द्वितीयस्य अत ओत्व भवति ॥ नमोकारो । परोप्परं ॥
अर्थ:-मस्कार और परस्पर इन दोनों शवों में दितीय-अ' का 'ओ' होता है। जो-गमकारःनमोक्कारो । परस्परम् = परोप्परं ।।
नमस्कार संस्कृत शम्ब है। इसका प्राकृत रूप नमोक्कारो होता है। इसमें सूत्र संख्या १-६२ से द्वितीय 'म'का 'ओं'; २-७७ से 'स'का लोप, २-८९ से 'क' का 'द्वित्वक, ३.२ से प्रयमा के एक वचन में पुल्लिा में "सि' प्रत्यय के स्थान पर 'ओ' होकर नमोक्कारी सिद्ध हो जाता है।
परस्परम् संस्कृत शब्द है । इसका प्राकृत रूप परोप्पर होता है । इसमें सूत्र संख्या १-६२ से द्वितीय-अ' का 'ओ'; २-७७ से 'स्' का लो०; २-८९ से हितोय 'प' का 'द्वित्व पर; ३-२५ से प्रथमा के एक वचन में नपुंसक लिंग में 'सि' प्रत्यय के स्थान पर 'म' प्रत्यय की प्राप्ति; और १.२३ से प्राप्त 'म'का अनुस्वार होकर परोप्पर बप सिद्ध हो जाता है।
वापो ॥ १-६३॥ अर्पयतौ धातौ श्रादेरस्य श्रोत्वं वा भवति ।। ओप्पेइ अप्पइ । श्रोप्पिय अप्पिा ।
अर्थ:-'यति धातु में आदि '' का विकल्प से 'ओ' होता है। जैसे-अर्पयति = ओप्पर और अम्पेड़ । अपितम् = मोस्पिर्क और अप्पिरं ॥
अर्पयति संस्कृत प्रेरणार्थक पिया पर है । इसके प्राकृत रूप मओप्पेइ अप्पे होते हैं। इसमें सूत्र संख्या १-१२ से बावि का विकल्प से 'ओ'; २-७१ से 'र'का लोप २-८९ से 'प' का विस्व ': ३-१४९ से प्रेरणार्थक में 'णि' प्रत्यय के स्थान पर यहां पर प्राप्त 'अय' के स्थान पर 'ए; और ३-१५९ से वर्तमान काल में प्रथम पुरुष में एक वचन में 'ति' प्रत्यय के स्थान पर '' होकर ओप्पेड़ और अप्पेह रूप सिद्ध हो जाते हैं।
अर्पितम् संस्कृत भूत कुवन्त क्रियापद है । इसके प्राकृत रूप ओपि और अप्पि होते हैं। इनमें सूत्र संख्या १-६३ से आदि का विकल्प से 'यो'; २.७९ से 'र' का लोप: २-८९ से 'प'का निस्व '' ३-१५६