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________________ ( १८९) (४२६) इस घटना को सुनकर खबर देने बाने गुप्तचर वहां आये जहां रणवास में रुक्मिणी बैठी हुई थी तथा कहने लगे कि बहुत सी स्त्रियों के सिर मूडकर और नाक कान काट कर विकृत रूप बना दिया है, ऐसा हमने सुना है। (४२७) इस बात को सुनकर रुक्मिणी ने कहा कि निश्चय रूप से यही प्रद्य म्न है । हे वीरों में श्रेष्ठ एवं साहस तथा धैर्य को रखने वाले सब कार्य छोड़कर प्रकट हो जाओ। प्रद्य म्न का अपने असली रूप में होना (४२८) तब प्रद्य म्न प्रकट हो गया जिसके समान रूप वाला दूसरा कोई नहीं था । वह अत्यन्त सुदर एवं लक्षण युक्त था । तब रुक्मिणी ने समझा कि यह उसका पुत्र है । (४२६) जब सक्मिणी ने प्रधम्न को देखा तो उसका सिर चूम लिया और गोद में ले प्रसन्न मुख होकर उसे कंठ से लगा लिया तथा कहा कि आज मेरा जीवन सफल है । श्राज का दिन धन्य है कि पुत्र श्रा गया । जिसे १० मास तक हदय में धारण कर बड़ा दुःख सइन किया था, मुझे यह पछतावा सदैव रहेगा कि मैं उसका बचपन नहीं देख सकी। (४३०) माना के वचन सुनकर वह पांच दिन का बच्चा हो गया । फिर वह क्षण भर में बढ़ कर एक महीने का हो गया तथा फिर वह प्रद्युम्न बारह महीने का हो गया। (४३१) कभी वह लौटने लगा, कभी हठ करने लगा और कभी दौड़कर आंचल से लगने लगा | वह कभी खाने को मांगता था और इस प्रकार उसने बहुत भेष उत्पन्न किये। (४३२) वहां इतना चरित करने के पश्चात फिर वह अपने रूप में आ गया । उसने कहा कि हे माता तुम्हें मैं एक कौतुक दिख लाऊंगा। सत्यमामा का हलधर के पास दुती को भेजना (४३३) अब दूसरी ओर कथा आ रही है। सत्यभामा ने स्त्रियों को बलराम के पास भेजा और कहलाया कि हे बलराम रुक्मिणी के ऐसे कार्य के लिये आप साक्षी बने थे ।
SR No.090362
Book TitlePradyumna Charit
Original Sutra AuthorSadharu Kavi
AuthorChainsukhdas Nyayatirth
PublisherKesharlal Bakshi Jaipur
Publication Year
Total Pages308
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Story
File Size5 MB
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