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भयउ उछाहु जगल' जागि, नयर मंगल किजइ । ता संख पूरिहि नावहि घर, पंच सबद वजहि ॥५६६॥ जबइ मयरण परिगह गए, घर घर नयरि वधाए भए । । । गुडी उछली घर घर बार, कामिणी गावइ मंगलचार ॥५६७॥
चौपई
विप्रति च्यारि वेद ऊच्चरइ, वर कामिणी तह मंगलु करइ। पून्न कलस तह लेइ सवारि, प्रागे होगा चली वर नारि H५६॥ नयरि उछाह करबहु घाइ, जब ते दिठे नयन परदवणु । सिंघासण वयसारिउ सोइ, पुरयन तिलकु करइ सत्रु कोइ ।।५६६॥ दहि दुव सिर प्राक्षित देइ, मोती माणिक थाल भरेइ । । कुमरहि सिर प्रारति उतारि, दे असीस चालड वर नारि ॥५॥
यमसंवर का मेघकूट से द्वारिका आगमन एतहु मेघकूट सो ठाउ जमसंवरु विजाहरु राज । माणिक कंचा माल संजूत, द्वारिका नयरी प्राइ पहुत ॥५७१।।
--.- -.... -. -. ---- (५६८) १. बंभरण (ग) २. उच्चरहि (ख) ऊच्चरहि (ग) मूलपाठ उच्छता ३. सिंघासन बसाल्यो सोन (ग) ४. सिरि (ख) ५. प्रागद होइ (ब) देइ असीस (प.
(५६९) १. कहइ भन्नु कवण (ख) २. पुरजरा (ख) यह पद्य ग प्रति । नहीं है।
(५७०) १. बहोय खूब (ख)
(५७१) १. सो ठाउ (ख) सो तेहि गेनुकूट जो हाउ (ग) तीसरा और वो पग प्रति में नहीं है । मूल पाठ विवाह