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पण्णासमो संधि [११] इरा, तु भी शीघ्र परमेश्वरी लंकासुंदरी के घर जा और वहाँमै सुन्दर भोजन ले आ, ऐसा कि जो सुरतिके समान सरस और सस्नेह, और सुन्दर हो। यह सुनकर वे दोनों इस प्रकार चलीं मानो गंगा और यमुना ही उछल पड़ी हों। रंधा हुआ भात्त लेकर, वे आयीं। वे विख्यात सरस्वती और लक्ष्मीके समान जान पड़ती थीं। उन्होंने भोजनकी थाली में सुन्दर चिकने पेयके साथ भोजन परोसा। शक्कर, खीर, दूध, लड्डू, नमक, गुड़, इक्षरस, मिठाई, रस, सोयवत्ती (?), घेवर, मूंगकी दाल, तरहतरहके कर, विविध और विचित्र कढ़ी, विचित्र माइंद और माइण फल, चिरमटा, कचोर, वासुत, पेउअ, पापड, केला, नारियल, जम्बीर, करमर, करौंदा, करीर, तरह-तरहकी कढ़ी, खटमिठी साडिव भाजी तथा और भी खांड़ और खांड़का सोरबा, बडवाइंगण, कारल्ल, मही, दही और दूध सहित व्यञ्जन तथा बधारे हुए कांजीर और सौवीर उस भोजनमें थे। इस प्रकार, वह उल्लसित और मुंहमें मीठा लगने वाला भोजन था। जो भी जहाँ उसे खाता, वह जिनवरके वचनोंकी भांति मधुरतम मालूत होता था॥१-१४॥
[१२] उस वैसे भोजनको कर सीता देवीने अपने मुखका प्रक्षालन किया। और उत्तम चन्दनके अवलेपके बाद हनुमानने सीतादेवीसे कहा, "माँ, मिरे कन्धेपर चढ़ जाओ। मैं वहाँ ले जाऊंगा जहाँ श्री राघसिंह हैं। वहीं मिलनेसे दोनोंके मनोरथ पूरे हो जायेंगे, और जनपदमें रामायणकी कथा भी फैल जायगी।" यह सुनकर सीतादेवी पुलकित हो उठीं। साधुवाद देकर उन्होंने हनुमानसे कहा, “गतगुण बहके लिए इस तरह अपने घर जाना चाहे ठीक हो परन्तु कुलवधूके लिए यह नीति ठीक